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राह से भटक गई है भाजपा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीते छह अप्रैल को भाजपा ने अपने जीवन के 25 साल पूरे किए. उससे तीन दिन पहले गोविंदाचार्य ने लालकृष्ण आडवाणी को फ़ोन किया. उनमें जो बातचीत हुई वह कई मायने में बहुत महत्वपूर्ण है. इस बातचीत को गोविंदाचार्य और लालकृष्ण आडवाणी ने बहुत दिनों तक अपने सीने में छिपा रखा था. गोविंदाचार्य ने भाजपा अध्यक्ष को सलाह दी थी कि वे छह अप्रैल को भाजपा को विसर्जित कर दें. एक समिति बना दें जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बात करे और तय कि नई पार्टी कैसी हो? यह सुनकर लालकृष्ण आडवाणी ने उनसे पूछा कि क्या यह आपकी सोची-समझी राय है. इस जिज्ञासा में भाव यह था कि क्या गोविंदाचार्य स्वयं ऐसा कह रहे हैं या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मंशा को जाहिर कर रहे हैं. भाजपा के रजत जयंती अधिवेशन से पहले एक पूर्व महासचिव की अध्यक्ष को यह सलाह वैसे तो साधारण सी बात लगती है, लेकिन ऐसा है नहीं. उसके बाद की घटनाएं इसकी गवाह हैं. जहाँ भाजपा आज है वह अंधा मोड़ है. सच बात यह है कि भाजपा के अस्तित्व पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. क्योंकि वह राह से भटक गई है. जब लालकृष्ण आडवाणी ने वेंकैया नायडू से कमान अपने हाथ में ली. उस समय कुछ लोगों को यह ख़ुशफ़हमी थी कि अब सब ठीक हो जाएगा. बहरहाल जो दावा किया गया था वैसा होता दिख नहीं रहा है. क्या यह अध्यक्ष के रूप में लालकृष्ण आडवाणी की विफलता है? इसी सवाल में भाजपा की वास्तविक समस्याएं छिपी हुई हैं. क़रीब एक साल पहले वे अध्यक्ष बने. उसके एक पखवाड़े के भीतर जो हादसा हुआ उससे भाजपा के शासन और अनुशासन के चिथड़े उड़ा दिए. उमा भारती ने मीडिया के सामने बगावती तेवर अपनाया. उन्हें तत्काल पार्टी से निलंबित किया गया. तनातनी इसके पहले हरिद्वार में भाजपा को संघ के एक संगठन विश्व हिंदू परिषद का बहिष्कार झेलना पड़ा. संघ और उसके संगठनों में इस कदर तनातनी और खुलेआम विरोध की वह पहली घटना थी.
यह सिलसिला उस समय विस्फोटक हो गया जब सरसंघचालक कुप्पहल्ली सीतारामैया सुदर्शन ने एक इंटरव्यू में सलाह दे डाली कि भाजपा के दोनों नेता यानी अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लें और युवा नेतृत्व को मौका दें. भाजपा के सामने रोज़-ब-रोज़ उभर रहे इन संकटों का वह आख़िरी झोंका नहीं था. इससे यह थाह पाई जा सकती है कि भाजपा की नाँव गहरे झंझावात में फंसी है. इसके लिए कौन है ज़िम्मेदार? वे ही जो नेतृत्व संभाल रहे हैं. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी. इनमें जो गुणात्मक और मात्रात्मक अंतर देखते हैं उनको असलियत नहीं मालूम है. 1973 से अर्थात जनसंघ के ज़माने से इन दोनों के हाथ में ही नेतृत्व रहा है. दोहरी सदस्यता का राजनीतिक जवाब देने के लिए भाजपा बनी. लेकिन उसने अपनाया गाँधीवादी समाजवाद. वहाँ से शुरू हुई भाजपा की आज तक की यात्रा में हर मोड़ पर उसके फ़ैसलों को देखें तो उसमें एक ऐसा सूत्र है जो उसके मूल रोक को प्रगट करता है. वह है-तात्कालिकता का राजनीतिक तकाज़ा. इसी से भाजपा संचालित होती रही है. चाहे विश्वनाथ प्रताप सिंह के बोफोर्स मुद्दे का आंदोलन हो या अयोध्या का मसला या राजग के शासन का कार्यकाल या आजकल की घटनाएं हों उनमें भाजपा तात्कालिकता के चलते लोक लुभावन मुद्दों के पीछे भागने की राजनीति करती रही है. इसका नतीजा यह हुआ है कि उसने विचारधारा को पुराने वस्त्र की तरह छोड़ा. सिद्धांतों से समझौता किया और ओट लिया गठबंधन के राजनीतिक धर्म का. इससे भाजपा की वैचारिक साख नष्ट हुई और विचारवान माने जा रहे नेताओं की कलई खुल गई. लालकृष्ण आडवाणी की पाकिस्तान यात्रा ने रही-सही कसर निकाल दी.मदन लाल खुराना के सवाल पर जो घमासान मचा, वह जितना सरल दिखता है, उतना ही जटिल है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व इस स्थिति में नहीं है कि वह पहले जैसा नैतिक प्रभाव का उपयोग कर भाजपा को पटरी पर ला दे. संघ लाचार पिछले आठ-दस महीनों की घटनाओं को गौर से देखने के बाद कहा जा सकता है कि इस समय भाजपा में जो कुछ हो रहा है उसे संघ लाचारी से देख रहा है.
एक बड़ा समूह इन घटनाओं को भाजपा में बदलाव की आहट मानता है. साफ़ है कि संघ भी गहरे द्वंद्व में है. इस बात पर आम राय नहीं है कि इस भाजपा का पुनः उद्धार हो सकता है. नीति, नेतृत्व और जनसमर्थन खो चुकी भाजपा को अपने अंदर झाँकने की ज़रूरत है. उसके नेता द्वय वैसे सर्वमान्य नहीं रह गए हैं जैसा पहले थे. छह साल की सत्ता ने भाजपा नेतृत्व को बेनकाब कर दिया है. यह कैसी विडंबना है कि भारतीय राजनीति में भाजपा अर्थात सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की स्वीकार्यता पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है, लेकिन उसका वाहक मानी जाने वाली भाजपा फिसड्डी साबित हो रही है. भाजपा में मदनलाल खुराना, यशवंत सिन्हा, बाबू लाल मरांडी आदि के जो बगावती तेवर हैं वे नेतृत्व को चैन से बैठने नहीं देंगे और पार्टी को परिष्कार का अवसर नहीं देंगे. राह के भटकी भाजपा को नए संस्कार की ज़रूरत है, लेकिन मौज़ूदा नेतृत्व यह काम नहीं कर सकता. भाजपा की राजनीति का परिष्कार नए नेतृत्व से ही संभव है. हो सकता है कि चेन्नई की कार्यसमिति से उसकी शुरूआत हो जाए. |
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