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मौक़े के मुताबिक बदलता चिंतन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक ही बात पर टिके रहना, ठहराव का सूचक है और ठहराव मूर्खों की विशेषता है और राजनीतिज्ञ मूर्ख नहीं होते. भाजपा की राजनीति इस नियम का अपवाद नहीं है. आर्थिक विषयों पर भाजपा के रुख का विश्लेषण करें, तो सबसे पहले जो मुहावरा दिमाम में कौंधता है, वह है-जैसी दिखे बयार, पीठ तब तैसी दीजे. भाजपा जब हालात को अपने आर्थिक चिंतन के हिसाब से नहीं बदल पाई, तो उसने अपने आर्थिक चिंतन को ही हालात के हिसाब से बदल लिया. भाजपा की पूर्वज पार्टी जनसंघ ने 1951 में जारी अपने पहले चुनावी घोषणापत्र में कांग्रेस की इस बात के लिए आलोचना की थी कि वह भारत को पश्चिम की कार्बन कापी बनाने पर तुली हुई है. इसके विरोध में जनसंघ ने स्वदेशी की भावना के पुनरुत्थान की बात की थी. जनसंघ का मत था कि स्वदेशी की भावना से विदेशी पूंजी पर निर्भरता से छुटकारा मिलेगा और उपभोक्तावाद पर रोक लगेगी. इसके बाद के दौर में कांग्रेस पार्टी का रुझान समाजवादी विचारधारा की ओर होता गया. साठ के दशक में उद्योगों के राष्ट्रीयकरण, सार्वजनिक क्षेत्र की बढ़ी हुई भूमिका के मसले पर कांग्रेस ने जो रुख दिखाया, वह लगभग वामपंथी पार्टियों के रुख के आसपास था. जनसंघ ने इस रुख का विरोध किया. पर सत्तर के दशक तक भारतीय राजनीति में समाजवाद की स्थिति ऐसी हो चुकी थी कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इसके जिक्र के बगैर अपना काम नहीं चला सकती थी. सो 1980 में जनसंघ के नये अवतार भारतीय जनता पार्टी ने गांधीवादी समाजवाद की बात की. इसमें न गांधीवाद जनसंघ का था और न समाजवाद. पर वह मौक़ा समाजवाद की बात का था. नब्बे के दशक के अंत में भाजपा ने स्वदेशी की बात फिर उठायी और भाजपा का नारा था-पोटाटो चिप्स नहीं चाहिए, कंप्यूटर चिप्स चाहिए. पर यह वह दौर था, जब ग्लोबलाइजेशन के पुरजोर विरोध की बात वह पार्टी नहीं कर सकती थी, जो केंद्र में सत्ता में आने के सपने देख रही हो. ग़ौरतलब है कि भाजपा के वोटबैंक में बड़ा हिस्सा उस मध्यवर्ग का है, जिसने ग्लोबलाइजेशन, उदारीकरण के बहुत फ़ायदे उठाए हैं. सो 1998 के चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने केलिबरेटेड ग्लोबलाइजेशन यानी नपे-तुले ग्लोबलाइजेशन की बात की. भाजपा ने स्वदेशी को आर्थिक राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश किया. पर बाद के हालात ने बताया कि स्वदेशी एक चुनावी नारे से ज्यादा कुछ नहीं था. भाजपा के सहयोगी संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने इस मसले पर भाजपा का कड़ा विरोध किया. बदलती व्याख्या मौक़े के मुताबिक तब भाजपा के महत्वपूर्ण नेता यशवंत सिन्हा ने स्वदेशी की नयी व्याख्या यह कह कर पेश की कि स्वदेशी का विचार यह है कि भारत को महान बनना चाहिए और भारत महान तब ही बन सकता है, जब वह सुपरपावर बन जाए. इसलिए स्वदेशी, ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण आपस में विरोधाभासी नहीं हैं.यशवंत सिन्हा ने तब बताया था कि स्वदेशी के उद्देश्य प्राप्त करने के लिए ग्लोबलाइजेशन श्रेष्ठ रास्ता है. फिर भाजपा ने यह दिखाया भी. पहले एनरान बिजली परियोजना पर भाजपा-शिवसेना गठबंधन का कहना था कि वह सत्ता में आने पर एनरान परियोजना को अरब सागर में फेंक देंगे. पर केंद्र में अपनी 13 दिनों की सत्ता के दौरान भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने इस परियोजना को मंजूरी दी. भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश का विरोध किया था, पर सत्ता में रहते हुए भाजपा ने बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को इज़ाज़त दी. भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए गैट के डंकल ड्राफ्ट का और डब्लूटीओ का विरोध किया. पर सत्ता में रहते हुए भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने ठीक वही सब किया, जो डब्लूटोओ की मांगों के अनुरुप था. भाजपा ने पहले पहले यही कहा कि पोटाटो चिप्स नहीं, कंप्यूटर चिप्स के क्षेत्र में विदेशी निवेश चाहिए. कुल मिलाकर भाजपा का आर्थिक चिंतन राजनीतिक चिंतन की तरह से ही भारी ऊहापोह, उठापटक और अस्पष्टता के दौर से गुजर रहा है. |
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