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'वरिष्ठ लोगों के बीच अहम आ रहा है' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पहला तो यह है कि भारतीय जनता पार्टी के अंदर अनुशासनहीनता क्यों बढ़ रहा है, इस मुद्दे को पार्टी को लेना चाहिए. इस मुद्दे में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कुछ वरिष्ठ लोगों के बीच अहम आ रहा है और हर कोई अपने सुर और अपने महत्व दे रहा है. यह किसी भी पार्टी की शक्ति को बढ़ाने वाली कोशिश नहीं हो सकती. कोई भी आदमी पार्टी का कितना भी महत्वपूर्ण व्यक्ति क्यों न हो उसको इतना महत्व न मिले कि वह पूरी पार्टी को नुक़सान पहुँचा सके और पार्टी के बुनियादी आज़ादी पर प्रहार करे. इस बीच यह भी कहा गया कि पार्टी को अगर सत्ता में आना है तो उसे अपनी विचारधारा में बदलाव करना चाहिए. यह उस समय भी समझ में नहीं आया था और अब भी नहीं आता कि अगर पार्टी विचारधारा को छोड़ेगी तो उसकी उपयोगिता क्या रह जाएगी. कोई भी पार्टी बुनियादी मुद्दे को लेकर चलती है और उनको हासिल करने के लिए असामान्य परिस्थिति में उसको सामंजस्य स्थापित करने पड़ते हैं लेकिन वह बुनियादी मुद्दों को नहीं छोड़ती. अब यह कहना कि हमें सत्ता में आने के लिए विचारधारा बदलनी पड़ेगी, तो इसका मतलब यह है कि सत्ता में आना ही बुनियादी ज़रूरत है और इसके लिए विचारधारा वगैर हम सैकेंडरी चीज़ मानते हैं. इसलिए हमने उस वक़्त भी कहा था कि इसका स्पष्टीकरण होना चाहिए कि जो हम जो बुनियादी मुद्दे लेकर चले थे उसपर कायम हैं और बाकी किसी को भी उसपर सवाल नहीं करना चाहिए. इस कार्यसमिति में ऐसे सभी बुनियादी मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए. मेरा मानना है कि मुख्य मुद्दा तो वही है समान नागरिक संहिता, एक समान संविधान हो, और सारे नागरिक को बराबरी का अधिकार हो, इसमें सब मुद्दे वैसे ही बने हुए हैं. भारतीय जनता पार्टी सत्ता में तो आई लेकिन गठबंधन में वह अपने एजेंडे को पूरा कर नहीं सकती थी. इसलिए न तो समान नागरिक क़ानून लागू हुआ और न ही जम्मू-कश्मीर में विशेष अधिकार में कमी हुई. और न ही अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने की कोशिश की. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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