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मंगलवार, 13 सितंबर, 2005 को 09:05 GMT तक के समाचार
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भाजपा में तेज़ होता अंतरसंघर्ष

वाजपेयी और आडवाणी
वाजपेयी और आडवाणी के इतने ख़राब रिश्ते कभी नहीं रहे
खुराना तो बहाना हैं. भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी और प्रतीक शिखर पुरूष अटल बिहारी वाजपेयी के सदा से जटिल और रहस्यमय संबंधों की सार्वजनिक रस्साकशी के इस सबसे ताजा संस्करण में मदनलाल खुराना सिर्फ़ रस्सी का मध्य बिंदु हैं.

रविवार की रात तक लगता था बाजी आडवाणी के हाथ लगी है क्योंकि लखनऊ में वाजपेयी ने दोनों के 50 साल पुराने संबंधों का हवाला देते और आडवाणी के पार्टी अध्यक्ष होने को रेखांकित करते हुए अपने बीच किसी मतभेद या ‘‘खटपट’’ से साफ इनकार कर दिया.

लेकिन बाद में माफ़ी माँग कर खुराना पार्टी में वापस आ गए. हालांकि यह मीडिया का अपना निष्कर्ष है कि वाजपेयी ने खुराना वापसी करवा के अपनी सर्वोपरिता साबित कर दी है.

समस्या सिर्फ़ यह है कि इस खेल में रेफरी मीडिया नहीं, जनता नहीं, भाजपा कार्यकर्ता भी नहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. ऐसा रेफरी जो कभी दृश्य और सार्वजनिक रूप से सक्रिय होता है, कभी अदृश्य लेकिन नेपथ्य में सक्रिय रहता है.

इतना होता तो भी स्थिति इतनी जटिल नहीं होती. लेकिन संघ परिवार के इस गहराते और फ़ैलते अंतर संघर्ष में स्वयं संघ भी एक पक्ष है.

इसके चलते संघ परिवार और ख़ास तौर पर भारतीय जनता पार्टी अपने रजत जयंती वर्ष में ऐसे अनजाने खतरनाक मोड़ पर आ खड़ी है जहाँ से उसका अस्तित्व और भविष्य बेहद धुंधले दिख रहे हैं.

तय तो यह था कि संसद के मानसून सत्र के बाद आडवाणी को जाना है. वाजपेयी ने यह गारंटी संघ को दी थी तब जाकर आडवाणी के जिन्ना के पुनर्मूल्यांकन से भन्नाया समूचा संघ परिवार शांत बैठने के लिए तैयार हुआ था.

अब आडवाणी स्क्रिप्ट से बाहर जा रहे हैं. खुराना के निष्कासन पर पलटकर घोषणा कर दी है कि वह पार्टी अध्यक्ष और विपक्ष के पद आसानी से नहीं छोड़ेंगे.

आडवाणी पलटे

उनका गणित है कि बिहार चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और भाजपा अच्छा प्रदर्शन करेंगे और उसके बाद आने वाली उलझी राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा और उसके सहयोगियों को आडवाणी के नेतृत्व की अनिवार्यता माननी पड़ जाएगी.

सत्ता और राजनीति के परम पद की इस चाहत में पूर्व उप प्रधानमंत्री आडवाणी अकेले नहीं हैं.वाजपेयी को भी एक बार फिर राष्ट्रीय विकल्प बनने के सपने ने छोड़ा नहीं है. लेकिन ज़्यादा आश्चर्यजनक आडवाणी का अड़ना है.

अपने जिन्ना भाषण से भाजपा को एक अनजानी नई मध्यमार्गी राह पर जबरन धकेल देने की लगभग क्राँतिकारी कोशिश को बीच में ही छोड़कर उन्होंने संघ के आगे वैचारिक समर्पण किया और जीवन-भर में कमाए गए नैतिक कद को गंवा दिया.

वह हिम्मत दिखाते तो भाजपा और समूचे संघ परिवार के भीतर एक गहरे वैचारिक मंथन और परिवर्तन की धुरी बन सकते थे.

अपनी ही उस जबर्दस्त पहल पर न अड़कर सिर्फ़ पद पर अड़ना उनके कद को और छोटा कर गया है.

खुराना के बहाने आडवाणी बनाम वाजपेयी बनाम संघ बनाम भाजपा का यह तिलिस्मी अंतरसंघर्ष दरअसल 120 संगठनों वाले वृहत्तर संघ परिवार के भीतर घुमड़ रहे गंभीर संकट की सतही चिंगारियाँ हैं.

समकालीन भारत की चुनौतियों के आगे इस परिवार की वैचारिक अस्पष्टता, ‘‘सांस्कृतिक’’ संघ के राजनीतिकरण, भाजपा के कांग्रेसीकरण, वैचारिक खोखलेपन और अहंकारों के टकराव ने राष्ट्र को परमवैभव तक ले जाने के उसके संकल्प के आगे परम सवाल खड़ा कर दिया है.

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