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संघर्षमय जीवन की लंबी दास्तान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक बहुत पुरानी कहावत है कि मन में लगन हो तो कोई भी काम असंभव नहीं होता. समय-समय पर कई लोग इसे चरितार्थ करते रहे हैं. लेकिन डा.निर्झरणी चक्रवर्ती ने जिस तरह अभावों और संघर्ष के बीच अपनी लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति के ज़रिए अपने जीवन में जो मुक़ाम हासिल किया है उसकी दूसरी कोई मिसाल मिलनी मुश्किल है. कोलकाता से लगभग 50 किमी दूर उत्तर 24-परगना जिले की जूट नगरी नैहाटी स्थित ऋषि बंकिम चंद्र महिला कालेज में ग्रुप डी कर्मचारी से शुरू होकर उसी कालेज की प्रिंसिपल बनने वाली श्रीमती चक्रवर्ती के संघर्ष की गाथा पेश है उनकी ही ज़ुबानी. "कहाँ से शुरू करूँ? हम छह भाई-बहन हैं. मैं बहुत छोटी थी तभी पिताजी रेलवे की नौकरी से रिटायर हो गए. उनकी पेंशन की रक़म से घर का ख़र्च पूरा नहीं पड़ता था तो पढ़ाई के पैसे कहां से आते? लेकिन पढ़ने की मेरी तीव्र ललक को देखते हुए स्कूल के शिक्षकों ने चंदा जुटा कर मेरी फ़ीस चुकाई. उसके बाद उसी स्कूल में ग्रुप डी कर्मचारी के तौर पर मेरी अस्थाई नियुक्ति करा दी. साठ रुपए महीने पर. इस नौकरी ने परिवार पालने में तो सहायता की ही, मेरी पढ़ाई भी जारी रखी. कोई काम छोटा नहीं मैं कप-प्लेट धोने के अलावा झाड़ू-पोंछा लगाती थी. तीन साल तक काम करने के बाद जब मैंने हाईस्कूल पास कर लिया तो यह पद स्थाई कर दिया गया. उसके बाद मुझे क्लर्क का काम दिया गया. मैं फ़ीस का लेखा-जोखा और रजिस्टर आदि संभालने लगी. कुछ दिन बाद क्लर्क की जगह निकली तो मुझे इस पद पर नियुक्त कर दिया गया. तब तक वेतन बढ़कर 115 रुपए हो गया था. इसके बाद मैंने ऋषि बंकिम चंद्र महिला कालेज में दाख़िला लिया. इसमें भी मुझे शिक्षकों से काफी सहायता मिली. लेकिन सुबह छह से 11.30 बजे तक नौकरी होने के कारण मैं पहले दोनों पीरियड मिस कर जाती थी. लेकिन सहपाठियों और शिक्षकों ने अलग से पढ़ाने की व्यवस्था कर मेरी पढ़ाई पूरी करवाई. धीरे-धीरे मैंने इंटरमीडिएट और फिर पहली श्रेणी में बीएसएसी पास कर लिया था. और उसके बाद संघर्षों के बीच ही मैंने पहली श्रेणी में एमएससी पास की. उसके बाद लेक्चररशिप के लिए आवेदन किया. लेकिन जिस कालेज में नौकरी मिली वह घर से इतनी दूर था कि आने-जाने में आठ घंटे लगते थे. फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी. इसी दौरान पीएचडी के लिए भी पंजीकरण करा लिया.
तीन साल पहले इस कालेज के प्रिंसिपल पद की वेकेंसी निकली तो मैंने आवेदन कर दिया. इस तरह मैं यहां प्रिंसिपल बन कर आ गई. जो कुछ मुझे दिया था... लेकिन मैं अपने संघर्ष के दिनों को भूली नहीं हूं. समाज ने मुझे काफी कुछ दिया है. मैं अब उसका कुछ हिस्सा लौटाने का प्रयास कर रही हूं. कॉलेज की दो हज़ार छात्राओं में से मैंने तीन सौ से ज्यादा ग़रीब छात्राओं की फ़ीस माफ कर दी है. मैंने गरीबी और अभाव को काफी नज़दीक से देखा है इसलिए मैं नहीं चाहती कि किसी और को ऐसा संघर्ष करना पड़े. अब भी कालेज परिसर में गंदगी देख कर मुझसे रहा नहीं जाता और खुद झाड़ू से उसे साफ़ करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं होती. घर की ज़िम्मेदारियों को निभाते और भाई-बहनों की शादी कर उनका घर बसाने में समय मुठ्ठी की रेत की तरह फिसलता रहा. इसलिए मैंने बहुत देर से शादी की. पति सत्यनारायण चक्रवर्ती,जो इंजीनियर थे, बीते साल ही रिटायर हुए हैं. एक बेटा है जिष्णु चक्रवर्ती, जो छठी कक्षा में पढ़ता है. लेकिन मुझे जीवन से कोई शिकायत नहीं है. गरीबी और अभावों के बीच मैं आज इस कुर्सी पर पहुंची हूं. समाज की मदद के बिना यह संभव नहीं था. मैंने जीवन से काफी कुछ पाया है. यह मेरे लिए संतोष की बात है. अब जो पाया है, उसका कुछ हिस्सा भी समाज को लौटा सकूं तो स्वंय को भाग्यशाली समझूंगी". |
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