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शुक्रवार, 26 अगस्त, 2005 को 14:07 GMT तक के समाचार
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मुंबई की ख़स्ताहाल इमारतें

मुंबई की एक इमारत
मुंबई में सबसे ज़्यादा जर्जर इमारतें शहर के दक्षिणी इलाक़े में हैं
मुंबई शहर मे बीते मंगलवार की रात एक और इमारत भरभराकर गिर पड़ी और 11 लोगों की मौत हो गयी.

इस बरसात में ये दूसरा हादसा है. पहला बारिश शुरु होते ही खार इलाके में हुआ था जब 24 जून को एक इमारत के गिरने से कम-से-कम पाँच लोग मारे गए थे.

इसके बाद से छोटी बड़ी कम-से-कम तीन और इमारतें गिर चुकी हैं.

ये उस शहर की इमारतें हैं जो देश भर में अपनी गगनचुंबी अट्टालिकाओं के लिए मशहूर है.

इस शहर में जो भारत की आर्थिक राजधानी या सपनों की नगरी जैसे लुभावने और गर्वीले नामों से भी जाना जाता है, ऐसी इमारतों की संख्या करीब 19 हज़ार है जिन्हें प्रशासन ने कभी भी गिर जाने वाली इमारतें क़रार दे दिया है.

अधिक बोझ

सबसे ज़्यादा बूढ़ी इमारतें शहर के पुराने और घने इलाके में हैं. दक्षिण मुंबई का ये इलाक़ा काफ़ी व्यस्त व्यापारिक हलचलों वाला है.

और इन हाँफ़ती-काँपती इमारतों पर इनकी क्षमता से कहीं बहुत ज़्यादा बोझ है.

इस बोझ में वे परिवार शामिल हैं ही जो बरसों और पीढ़ियों से चंद रुपए किराए पर इनमें रहते चले आ रहे हैं.

कपड़ों के थोक व्यापार के केंद्र कालबादेवी इलाके की करीब 95 साल पुरानी एक इमारत में रहने वाले बाबूलाल बताते हैं,"मेरी बिल्डिंग में पहले माले पर जब जब कपड़े की गाँठें पटकी जाती हैं तीसरे माले पर हमारे कमरे में लगता है भूकंप आ गया हो."

तीन पीढियों से यहां रह रहे बाबूलाल का कहना है,"ये गोदाम-वोदाम तो अभी 10-15 साल से यहाँ हैं. इमारत की हालत हालाँकि पहले भी बहुत अच्छी नहीं थी पर इनके आने के बाद तो बहुत तेज़ी से खराब हुई."

प्रशासन

मुंबई की एक इमारत
जर्जर इमारतों में अधिकतर इमारतें सरकारी हैं

शहर की इन चरमराती 19 हजार इमारतों में से ज़्यादातर की मालिक या तो बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) है या फिर महाराष्ट्र आवास एवं नगर विकास प्राधिकरण(म्हाडा).

निजी मालिकाने वाली इमारतें काफी कम हैं. बीएमसी के अधिकारी आजकल इन इमारतों के बारे में खुलकर बात नहीं करना चाहते.

बहुत कुरेदने पर वे सफाई देते हैं कि उनके बस में ज़्यादा कुछ नहीं है. जिन इमारतों को बीएमसी खतरनाक पाता है उनमें रहने वालों को इमारत खाली करने की नोटिस और खतरे की चेतावनी भर दी जाती है. वह भी निजी इमारतों को ही.

मजबूरी

पहले इन इमारतों की मरम्मत न कराने पर जुर्माने का भी प्रावधान था पर अब वह भी नहीं है. ऐसे में मालिक मरम्मत से बचते हैं, किराएदार अपना पैसा खर्च नहीं करना चाहते और मालिक तो चाहता है कि इमारत गिर जाए क्योंकि रेंट कंट्रोल एक्ट के मुताबिक इमारत गिरते ही किराएदारों के हक़ ख़ुद ही ख़त्म हो जाते है.

लेकिन इनमें बसे काफी परिवारों की हैसियत न तो इन चंद रुपयों से ज्यादा किराया चुकाने की है और न ही कहीं और सिर छिपाने का विकल्प. राकेश गुप्ता तंग सड़कों वाले भूलेश्वर इलाके में ऐसी ही एक इमारत सें अपनी पत्नी, दो बच्चों, मां बाप और दो नौकरों के साथ बरसों से रह रहे थे.

लेकिन इस साल वे अपने परिवार को बारिश से ढीक पहले कांदिवली इलाके में नये फ्लैट में ले गए.

उनकी पत्नी गीता बताती हैं,"छोटा घर और बड़ा परिवार तो दिक्कत थी ही, साठ साल पुरानी इस इमारत की हालत देखकर भी जी घबराता रहता था. लेकिन राकेश के जैसे खुशकिस्मत परिवार बहुत कम हैं."

बीएमसी में समाजवादी पार्टी पार्षद दल के नेता मोहसिन हैदर कहते हैं,"खतरनाक इमारतों की मरम्मत के लिए कोई क़ानून न होना इनको और खतरनाक बनाता है. इन इमारतों में रहने वालों के पुनर्वास के लिए भी झुग्गी झोपड़ी पुनर्वास योजना की तरह का प्रावधान होना चाहिए. इससे खंडहर होती इमारतों के मालिक इनको फिर से बनाने में रुचि लेंगे."

मुंबई में झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों को बेहतर आवास मुहैया कराने की पुनर्वास योजना के तहत बिल्डरों को ये सुविधा दी जाती है कि वे झुग्गियों में रहने वाले लोगों को पक्के मकान बना कर दें.

और बाक़ी ज़मीन पर झुग्गीवासियों के लिए बनाए गए मकानों के क्षेत्रफल के ढाई गुना क्षेत्रफल पर रिहायशी इमारते बना कर उन्हें व्यावसायिक भाव पर बेचें. इस मुनाफ़े के लिए बिल्डर तेज़ी से झुग्गियों वाले इलाक़ों में रुचि लेने लगे हैं.

परवाह नहीं

अगर ये कहा जाए कि मुंबई की किसी भी खस्ताहाल इमारत की सरकार को कोई परवाह नहीं तो शायद गलत नहीं होगा. हाल में ही ढह गयी एस्प्लेनेड मेंशन या वाटसन होटल की इमारत इसकी ताज़ा मिसाल है. 119 साल पुरानी ये इमारत वर्ल्ड हेरिटेज में शुमार होती थी.

विक्टोरियनकाल के दुर्लभ लौहवास्तु की ये इमारत खतरे में है इसकी चेतावनी स्थानीय ग़ैर सरकारी संगठनों ने ही नहीं अमेरिका के वर्ल्ड मॉन्युमेंट वॉच ने भी दी थी.लेकिन इन सभी के चेताने के बाद भी किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी. और एक विश्व विरासत खत्म हो गयी.

भाजपा के विधायक और पूर्व आवासमंत्री राज पुरोहित बुज़ुर्ग इमारतों की खस्ता हालत के लिए बीएमसी और म्हाडा में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा कारण मानते हैं. उनका कहना है – ‘इन सरकारी एजेंसियों के अफसर और ठेकेदार मिलकर पुरानी इमारतों की मरम्मत के नाम पर करोड़ो कमा रहे है, लेकिन इमारतों की हालत पर कोई फर्क नहीं पड़ता. इस भ्रष्टाचार पर काबू पाने की न तो कोई कोशिश की जा रही है न ही राज्य सरकार को मुंबई की समस्याओं से निपटने का अनुभव है. ‘

यहां ये बताना ज़रूरी है कि ज़्यादातर खस्ताहाल बिल्डिंगों की मालिक या तो बीएमसी है या फिर म्हाडा और इन इमारतों की देखरेख और मरम्मत के लिए बाकायदा एक रिपेयर बोर्ड है जो हर साल अपनी इमारतों की बड़े पैमाने पर मरम्म्त का दावा करता है और भारी भरकम रकम खर्च करता है.

किराएदार

मुंबई की इन पुरानी इमारतों में 90 फ़ीसदी किराएदार रहते हैं. उनके संगठन मुंबई भाड़ेकरुं एकता संघ के अध्यक्ष ऐडवोकेट राज पुरोहित कहते हैं,"इस पूरी समस्या से निपटने का एक ही रास्ता है, पुरानी इमारतों का रीडेवलपमेंट, यानी नये सिरे से निर्माण."

लेकिन किराएदार संघ उन गैर सरकारी संगठनों से काफी नाराज़ है जो रीडेवलपमेंट की प्रक्रिया में उनके मुताबिक रोड़े अटका रहे हैं. किराएदार संघ का कहना है कि इन संगठनों के लोगों को किराएदारों की दिक्कतों और खतरों की परवाह नहीं, चौड़ी सड़कें न होने की चिंता है.

अदालत में ऐसे ही तर्कों के दम पर वे रीडेवलपमेंट का विरोध कर रहे हैं.

पुरोहित कहते हैं – ‘ये सरकार की अनुभवहीनता और ढीलाढाला रुख ही है जो वह अदालत को सही जवाब नहीं दे पा रही. नहीं तो सड़के तो न्यूयॉर्क में भी चौड़ी की गयीं थी और अपने मुंबई में भी की जा रहीं हैं.’

ये चाहे सरकार की अनुभवहीनता हो या कानूनी दांवपेंच या फिर महज़ भ्रष्टाचार. सच केवल ये है कि सपनों के शहर की इन इमारतों में रहने वाले करीब एक करोड़ लोग रोज़ जागते सोते केवल डरावने सपने ही देख पा रहे हैं.

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