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पाँच हज़ार रूपए में बना रेडियो स्टेशन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हरियाणा के तीन छात्रों ने एक रेडियो स्टेशन तैयार किया है जिसे वे सूटकेस रेडियो स्टेशन कहते हैं, इस रेडियो स्टेशन का वज़न 12 किलो है जिसे बनाने में पाँच हज़ार रूपए की लागत आई थी. इस रेडियो स्टेशन के कार्यक्रम पंद्रह किलोमीटर दूर तक सुने जा सकते हैं. कमलजीत, विकास मार्कण्डेय और दयाल सिंह कहते हैं कि इस सूटकेस रेडियो स्टेशन के लिए तमाम सामान उन्होंने अंबाला के बाज़ार से जुटाए और इसमें कोई भी विदेशी सामान नहीं लगा है. वे कहते हैं, "हम अपने विश्वविद्यालय के छात्रावास में यह रेडियो स्टेशन चलाया करते थे और यह छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय था. हमारे पास विश्वविद्यालय के बाहर से भी फोन आया करते थे कि फलां गाना बजाइए. हमारे प्रोफ़ेसरों को भी इस बारे में पता था पर उन्होंने हमें कभी रोका नहीं." हालाँकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 के अपने एक फ़ैसले में यह कहा है कि रेडियो की तरंगों पर जनता का अधिकार होना चाहिए न कि सरकार का, पर आज भी इस देश में आम आदमी के लिए रेडियो स्टेशन चलाना गैरकानूनी है. कमल, विकास और दयाल कहते हैं, "यह रेडियो स्टेशन तो एनालॉग है पर वे बीस हजार रूपए में डिजिटल एफएम रेडियो स्टेशन बनाकर दे सकते हैं. इस बीस हजार रूपए में हम आपको एक सीडी प्लेयर, कैसेट प्लेयर, चार चैनल का मिक्सर, दो माइक और एन्टेना केबल के साथ देंगे यानी यह आपका पूरा चलता-फिरता रेडियो स्टेशन होगा." वे कहते हैं, "हम यहाँ किसी आविष्कार की बात नहीं कर रहे हैं. ये तकनीकें तो सैकड़ों साल से उपलब्ध हैं, हम सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि यह तकनीक कितने सस्ते में विकसित की जा सकती है." और भी हरियाणा इकलौता प्रदेश नहीं है जहाँ रेडियो के इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं जो ग़ैर क़ानूनी हैं.
पिछले दिनों दक्षिण भारत की एक स्वयंसेवी संस्था ने सारे देश से आए आदिवासियों के एक सम्मेलन में एक साथ चार एफएम रेडियो स्टेशन चलाए, इन चार स्टेशनों पर लगातार बैठक की गतिविधियों का चार आदिवासी भाषाओं में अनुवाद होता रहा. कान पर हेडफोन लगाए आदिवासी पचास रूपए के एफएम रेडियो सेट पर भाषणों का अनुवाद सुनते रहे और चूंकि बैठक में क्या कहा जा रहा है यह उनकी समझ में आ रहा था इसलिए बैठक में उनकी भागीदारी देखने योग्य थी. पर विशाखापत्तनम के पास एक आदिवासी संगठन की महिलाएँ इतनी भाग्यशाली नहीं हैं, उनके रेडियो स्टेशन के सामान को पुलिस ने गैरकानूनी बताते हुए पिछले दिनों ज़ब्त कर लिया. इन संस्थाओं को तकनीकी मदद पहुँचा रहे रेडियोफोनी संस्था के विक्रम कृष्णा कहते हैं, "यहाँ पर हम उसी रेडियो तकनीक का उपयोग कर रहे हैं जिसे बडे शहरों में तमाम मल्टीनेशनल कंपनियों की हिफाज़त में लगी विदेशी सुरक्षा एजेंसियां भी अपने वॉकी-टॉकी के लिए इस्तेमाल करती हैं. यह अजीब है कि हमारी सरकार एक विदेशी सुरक्षा एजेंसी पर तो भरोसा कर सकती है पर गरीब आदिवासी महिलाओं पर नहीं." हाल में सरकार ने शैक्षणिक संस्थाओं को रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति तो दी है पर रेडियो को आम जनता तक ले जाने के आंदोलन से जुडे फ्रेड नोरोन्हा कहते हैं कि "इतने सस्ते उपकरणों से इस देश के हर गाँव में एक रेडियो स्टेशन चलाया जा सकता है. इस देश का हर आदमी उस सूचना क्रांति में भाग ले सकेगा. भारत जैसे गरीब देश में मीडिया के लोकतंत्रीकरण के लिए रेडियो के अलावा और कोई माध्यम नहीं है." |
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