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कोलकाता में हाथरिक्शों पर लगेगी रोक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कोलकाता की पहचान माने जाने वाले हाथरिक्शा पर जल्द ही पाबंदी लगने वाली है. पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का कहना है कि हाथरिक्शा अमानवीय हैं और दुनिया में इस तरह के रिक्शे कहीं नहीं चलाए जाते. राज्य के मुख्यमंत्री का कहना है कि अगले चार-पांच महीनों में कोलकाता में हाथरिक्शा चलने बंद हो जाएँगे. 'दो बीघा ज़मीन' और 'सिटी ऑफ़ ज्वाय' जैसी फ़िल्मों में हाथरिक्शा चलाने वाले के दुख-दर्द का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है, हाथरिक्शा पहली बार चीन से 19वीं सदी में बंगाल पहुँचा. मुख्यमंत्री ने कहा है कि उनकी सरकार हाथरिक्शा का विकल्प भी ढूँढ रही है ताकि रिक्शा चालक और सवारियों को तकलीफ़ न उठानी पड़े. भट्टाचार्य कहते हैं, "इसका मतलब है पैसा और ट्रेनिंग, हाथरिक्शे इस वर्ष के अंत तक ही पूरी तरह हट पाएँगे." भविष्य एक्शनएड नाम की एक ग़ैर सरकारी संस्था के हाल के सर्वेक्षण के मुताबिक़, कोलकाता में 18 हज़ार हाथरिक्शा चालक हैं और हर वर्ष लगभग दस प्रतिशत नए लोग इस काम से जुड़ते हैं. कोलकाता के लोग काफ़ी शंकित हैं कि बिना हाथरिक्शा के वे पुराने कोलकाता की संकरी गलियों में किस तरह चल पाएँगे, ख़ास तौर बारिश के मौसम में जब घुटनों तक पानी जमा हो जाता है. कोलकाता की एक गृहिणी दिपाली नाथ कहती हैं, "जब सीने तक पानी जम जाता है तो किसी और सवारी से काम नहीं चलता, लेकिन आप देखेंगे हाथरिक्शा फिर भी चल रहे हैं." रिक्शाचालकों के यूनियन की माँग है कि उन्हें पर्याप्त मुआवज़ा और जीवनयापन के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराएँ जाएँ उसके बाद हाथरिक्शा पर रोक लगाई जाए. रिक्शाचालक यूनियन के नेता मोहम्मद निज़ामुद्दीन कहते हैं, "मैं आशा करता हूँ कि सरकार रिक्शाचालक को भूखा नहीं मारेगी." अब देखना यही है कि इस घोषणा पर सरकार किस हद तक अमल कर पाती है क्योंकि इस तरह की घोषणा पहली बार नहीं हो रही है, पहले भी कई बार हाथरिक्शा पर रोक लगाने की बात हुई है लेकिन वे न सिर्फ़ चलते रहे हैं बल्कि उनकी तादाद बढ़ी है. |
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