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शुक्रवार, 24 जून, 2005 को 13:29 GMT तक के समाचार
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'सत्ता इंदिरा गाँधी की कमज़ोरी थी'

चंद्रशेखर
जो रुख इंदिरा गाँधी ने अपनाया था, वैसे में उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचा था. ऐसा भी नहीं था कि सारी परिस्थितियाँ अचानक प्रगट हो गईं.

अगर इंदिरा जी को प्रधानमंत्री बने रहना था तो आपातकाल के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं था.

इंद्रकुमार गुजराल हमारे पुराने मित्रों में से हैं. गुजराल इंदिरा गाँधी के सलाहकारों में से एक थे.

एक दिन गुजराल हमारे पास आए. उन्होंने कहा कि आपका और इंदिरा जी का समझौता हो जाना चाहिए.

हमने कहा कि समझौते की कोई बात ही नहीं है. हम लोग दो रास्तों पर चल रहे हैं. इंदिरा गाँधी के लिए ऐसा करना मज़बूरी ही थी.

हमने गुजराल से कहा कि थोड़े दिन बाद यह ख़बर पढ़ोगे कि मैं ट्रक से दबकर मर गया या जेल चला गया.

गुजराल कहने लगे कि आप ऐसा क्यों सोचते हैं? इंदिरा गाँधी को जवाहरलाल नेहरू ने ट्रेनिंग दी है.

मैंने उनसे कहा कि मैं जवाहरलाल नेहरू को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता. उनसे मेरा कोई परिचय भी नहीं था.

मैंने तो अपनी विवशता जाहिर कर दी. मैंने गुजराल से कह दिया कि “न तो मैं बदलने वाला हूँ, न ही वो.” इस मुलाकात के 15 दिनों के भीतर इमरजेंसी लग गई.

सलाह मशविरा

मैंने चुनावों को लेकर कोई सलाह तो दी नहीं थी. हाँ, एक ही दिन मैंने जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गाँधी को ख़त लिखा था.

इंदिरा गाँधी को अंग्रेजी में और जयप्रकाश नारायण को हिंदी में पत्र लिखा.

मैंने जेपी को लिखा कि “जो लोग आपके साथ आ रहे हैं, उनका संपूर्ण क्राँति से कोई लेना देना नहीं है.

ये लोग आपके साथ सिर्फ़ इसलिए हैं ताकि इनको “पॉवर पॉलिटिक्स” में हिस्सेदारी मिल सके और ये नौज़वान नेता आने वाले दिनों में जातियों के नेता हो जाएंगे.

अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए ये लोग आपको भी भूल जाएंगे. इंदिरा गाँधी को लिखा कि कम्युनिस्ट आपको आगे बढ़ा रहे हैं.

आपके और जेपी के बीच झगड़ा होगा तो देश का भारी नुक़सान होगा. आदर्शों और सिद्धांतों पर आपका उनसे मतभेद नहीं है.

मैंने एक सार्वजनिक बयान दिया कि देश को आज जेपी की “मॉरल ऑथिरिटी” और इंदिरा गाँधी को “स्टेट पॉवर” की ज़रूरत है.

दोनों को मिलाकर देश का भला हो सकता है. अन्यथा देश पर खतरों के बादल मंडरा रहे हैं. किसी ने मेरी बातों को गंभीरता से नहीं लिया.

एक समय लग रहा था कि जेपी और इंदिरा गाँधी में समझौता हो जाएगा.

जब समझौता करीब-करीब फाइनल स्टेज में पहुँच गया तो हमारे मित्र रामनाथ गोयनका और गंगा बाबू ने उसमें अड़ंगा लगा दिया.

व्यक्तित्व

राजनीति के शिखर पर आज जो चेहरे दिख रहे हैं, उनसे वे हज़ार गुना अच्छी थीं.

लेकिन सत्ता उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी. पॉवर अपने हाथ में रखना चाहती थीं.

इसी कारण न तो वह देश का भला कर सकीं और न ही अपना. उनकी सोच थी कि पॉवर परिवार को ही मिलनी चाहिए. बेटे को ही मिलनी चाहिए.

जिन लोगों ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया था, उनकी सोच यह थी कि यह महिला कुछ नहीं कर पाएगी. और वे लोग सत्ता को अपने मन-मुताबिक चला सकेंगे.

लेकिन हुआ इसके उलट. हाथ में पॉवर आने के बाद वह अपने ढंग से सत्ता चलाने लगीं. लेकिन उनकी इच्छाशक्ति बहुत दृढ़ थी.

('चंद्रशेखर-रहबरी के सवाल' साभार)

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