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इंदिरा गाँधी को सत्ता का लालच था | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आपातकाल का हम लोगों पर गहरा असर हुआ. जब हम जेल से निकलकर बाहर आए तो हम लोगों ने एक संकल्प लिया था कि फिर कभी ऐसी स्थिति नहीं आनी चाहिए. हमें पूरा विश्वास नहीं है कि ऐसी स्थिति नहीं आएगी. इंदिरा गाँधी जब तानाशाह बनी तो उसके पहले से उन्होंने राज्य सरकारों को उखाड़ फेंकने का काम शुरू कर दिया था और एक ऐसी माहौल बना रखी थीं जहाँ एक व्यक्ति का दबदबा हो. और आज की बात नहीं मैं पिछले कई महीने से कह रहा हूँ कि मुझे वही दिन याद आ रहे हैं जो हम लोगों ने झेले थे. मैं जेल जाने से पहले भूमिगत था. टेलिकॉम में काम करने वाले कुछ कर्मचारी आए जिनका मेरे साथ ट्रेड यूनियन से रिश्ता था. वे सुबह आए और बोले कि आपातकाल की घोषणा हो गई है. मैंने कहा कि आपातकाल तो बहुत दिनों से है इसमें नया क्या है तो उन्होंने मोरारजी देसाई की गिरफ़्तारी और एक दो अन्य ख़बरें बताईं. मैं इसके लिए तैयार था. बहुत पहले से मैं कह रहा था कि हर दीवार पर दिखाई दे रहा है कि इंदिरा गाँधी देश को तानाशाही की तरफ़ ले जा रही हैं. मैं एक मछुआरे का लुंगी और गमछा लेकर वहाँ से वडोदरा चला गया. वडोदरा इसलिए गया क्योंकि वहाँ ग़ैर कांग्रेस सरकार थी और हमें लगा कि कुछ समय के लिए रणनीति बनाने का मौक़ा वहाँ मिलेगा. काफ़ी लोग तो गिरफ़्तार हो गए थे और कुछ जो इधर-उधर नौज़वान इधर-उधर थे उनको इकट्ठा किया. हमारे सभी लोगों ने कहा था कि हमें तो गाँधी जी के रास्ते से ही जाना है. न किसी के जान पर हमला करना है और न ही किसी को चोट लगने देनी है. हमें केवल यह बताना था कि देश ने इसे स्वीकार नहीं किया है और देश में लोग लड़ रहे हैं चाहे जिस तरह से हो. और फिर एक दिन आया जब हमारी गिरफ़्तारी हो गई. गिरफ़्तारी के बाद तीन-चार जेलों में पहुँचा दिया. वैसे तो मैं मज़दूर आंदोलन में बहुत बार जेल गया. पता नहीं कितने बार जेल गया होऊंगा. लेकिन पहली बार हाथों में बेड़िया और शरीर को जंजीर से जकड़ा गया. और इसी तरह अदालत में प्रतिदिन सुबह तिहाड़ जेल से लाया जाता था. आपातकाल की वजह एक ही थी सत्ता ख़ानदान में बनाए रखना और कुछ नहीं, जो आज भी चल रहा है. मेरा मानना है कि यह सत्ता का लालच था और कुछ भी नहीं. (रेणु अगाल से बातचीत पर आधारित) |
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