|
मॉडल निकाहनामे में सुधार की माँग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मॉडल निकाहनामे को सामने आए अभी महीना भी नहीं हुआ था कि मुस्लिम महिलाओं के हक़ों के लिए काम कर रहे संगठनों ने इसे अधूरा और ख़ामियों भरा बताते हुए इसमें संशोधन के लिए एक प्रस्ताव पारित किया है. इस प्रस्ताव में मॉडल निकाहनामे को दुरुस्त करने के लिए कुछ सुझाव सामने रखे गए हैं और यह माँग की गई है कि इनको लागू किए बग़ैर किसी निकाहनामे को मंज़ूरी देने की बात बेमानी ही है. पर्सनल लॉ बोर्ड ने 30 अप्रैल को ही यह मॉडल निकाहनामा लोगों के सामने रखा था. इस निकाहनामे की समीक्षा के लिए तक़रीबन आधा दर्जन महिला संगठनों ने राजधानी दिल्ली में मंगलवार को एक समीक्षा बैठक की और एक मसौदे को मंज़ूरी दी. इनमें अखिल भारतीय महिला परिषद, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति, भारतीय राष्ट्रीय महिला महासंघ और मुस्लिम महिला मंच जैसे संगठन शामिल थे. प्रस्ताव अपनी माँगों को लेकर सामने लाए गए इस प्रस्ताव में महिला संगठनों ने माँग की है कि तीन तलाक के मसले पर बोर्ड को कड़ा रुख़ लेना चाहिए था और इसे तत्काल ख़त्म करना ज़रूरी है. साथ ही एक से ज़्यादा शादियों के मामले में कड़ा रुख़ अख़्तियार करते हुए इस प्रथा को तत्काल रोकने की सिफ़ारिश की गई है. माँगपत्र में कहा गया है कि तलाक लेने वाली महिला और उसके बच्चों के हक़ों को स्पष्ट रूप से सामने लाने की ज़रूरत है और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि मेहर की रक़म को एक बार में ही अदा किया जाए. इसके अलावा यह भी कहा गया है कि शादी की सूरत में दहेज की माँग, दावत आदि चीज़ें हराम हैं और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए. ख़ामियाँ महिला संगठनों ने मॉडल निकाहनामे की जिन ख़ामियों का ज़िक्र किया है, उनमें सबसे बड़े सवाल के तौर पर ज़मीन में महिलाओं का हक़, मेहर की रक़म, तीन तलाक और बहुविवाह को प्रमुखता से शामिल किया गया है. नेशनल फ़ेडरेशन फ़ॉर इंडियन विमेन की महासचिव सहबा फ़ारूकी ने इस बारे में बीबीसी से बातचीत में कहा, “तमाम बातें ऐसी हैं, जिनके बारे में निकाहनामे में कुछ साफ़तौर पर नहीं कहा गया है. इनमें तीन बार तलाक का मसला तो है ही, इसके अलावा महिलाओं को ज़मीन में हक भी नहीं दिया गया है.” सहबा फ़ारूकी कहती हैं, “महिलाओं के लिए ज़मीन में हक़ का मसला केवल आर्थिक महत्व ही नहीं रखता है बल्कि इससे उस महिला की सामाजिक सुरक्षा भी तय होती है, समाज में उसकी ताक़त बनती है.” बोर्ड ही क्यों पर क्या इन प्रस्तावों से बोर्ड को फ़र्क पड़ता है और वो इन्हें मानने के लिए बाध्य होगा, पूछने पर अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की अध्यक्ष, सुभाषिनी अली बताती हैं, “हम इसके लिए प्रयासरत हैं और अपनी लड़ाई को आगे ले जाएँगे. इतने वर्षों के बाद बोर्ड ने निकाहनामे को मंज़ूरी दी है. हम इसमें सुधार के प्रयास करेंगे.” मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कोई सरकारी और संवैधानिक संस्था तो है नहीं, फिर महिला संगठन उसकी सहमति की उम्मीद क्यों रखती हैं, इस बारे में सुभाषिनी अली कहती हैं, “मैं इससे सहमत हूँ पर मुस्लिम समुदाय के लोगों की एक बड़ी आबादी का बोर्ड में विश्वास है और बोर्ड जो कहता है, तमाम लोग उसे मानते हैं.” वैसे महिलाओं के लिए अब एक अलग पर्सनल लॉ बोर्ड भी है पर इस बाबत सहबा फ़ारूकी मानती हैं कि ऐसे किसी भी बोर्ड को मानना ग़लत है और वो उसे अपनाने को तैयार नहीं हैं. अन्य संगठनों की महिलाओं ने भी कहा कि बोर्ड या किसी और क़ाज़ी, पंचायत आदि को महिलाओं के मसले में किसी भी तरह के वैधानिक अधिकार देना बिल्कुल ग़लत है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||