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'अप्रवासी भारतीयों में सरकारी दिलचस्पी कम' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अप्रवासी भारतीयों के लिए पिछली सरकार ने नई दिशाएं और नए संकल्प दिए थे. लेकिन इस मामले में केवल प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता परिलक्षित हुई है और सरकार की तरफ़ से इसमें कमी दिखी है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब भी भारत के बाहर जाकर बोले हैं तो उन्होंने भारतवंशी समाज को संबोधित किया है और कहा है कि अब आप भारत वर्ष के लिए सेतु बनाएं. लेकिन भारत सरकार के मंत्रालय में कोई रूझान नज़र नहीं आता. जो मंत्रालय इसके लिए गठित है, उसके बारे में किसी को जानकारी नहीं थी. मंत्रालय में नीति की दृष्टि से जो काम हुआ है, वह विश्वास नहीं दिलाता कि भारत सरकार इस निरंतरता को कायम रख पाएगी. शुरूआत में एक वेग होता है, गति होती है, उत्सुकता होती है किंतु लगता है कि पिछले वर्ष में उस उत्साह में कमी आई है और इसके लिए जो प्रभावी क़दम उठाने चाहिए, वे नहीं उठाए गए हैं. इसके पीछे कारण क्या हैं, इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है, यह अलग बात है और मैं इसमें नहीं जाना चाहता. लेकिन भारतवंशी समाज को ख़ुद कदम उठाने पड़ेंगे, स्वयं ऐसे प्रभाव उत्पन्न करने पड़ेंगे जिससे प्रवासी भारतीयों के मुद्दे और मसले हाशिए पर नहीं चले जाएं. मैंने सरकार को इसके लिए 650 पृष्ठ की एक रिपोर्ट सौंपी है जिसमें क़रीब 200 अलग-अलग सिफ़ारिशें हैं. दृष्टि का अभाव सिफ़ारिशें ऐसी हैं जिसका क्रियान्वयन किया जाना चाहिए था, किंतु इसके लिए जो संकल्प और राजनीतिक दृष्टि चाहिए, उसका अभाव है. खाड़ी देशों में रहने वाले भारतवंशियों के लिए कई क़दम उठाने की बात की है, जिसमें से अब तक कुछ ही क़दम उठाए गए. विज्ञान, पूँजी निवेश, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, पर्यटन, सांस्कृतिक सहयोग और नए सार्वजनिक उपक्रम चलाने के क्षेत्र में जो सिफ़ारिशें की थीं, वे सरकार के ठंडे बस्ते में ही पड़ी हैं और ऐसा नहीं लगाता कि इसमें कोई रूचि ले रहा है. केवल प्रधानमंत्री इस पर ज़ोर दे रहे हैं. इसके अलावा न तो कोई कहने वाला है न करने वाला. दोहरी नागरिकता के सवाल पर पिछली सरकार को एक रिपोर्ट दी गई थी जिसको तत्कालीन सरकार ने उसे स्वीकार कर लिया था. पिछली लोकसभा और राज्यसभा के समय इसके संबंध में क़ानून पारित हो गया था. परन्तु उसे लागू करने में काफ़ी देरी की गई. लागू भी हो गया लेकिन लागू करने के पीछे जो दृष्टि थी उस पर अभी अमल में नहीं लाया गया है. उसके लिए भी गहरी सोच और समझ की ज़रूरत है और दलगत राजनीति से ऊपर उठने की आवश्यकता है. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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