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'अपने घर के दरवाज़े मेरे लिए नहीं खुले...' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन अपनी राष्ट्रीयता तेज़ी से बदल रही थी. पीठ पर अपना बैग लादे मैं पाकिस्तान की तरफ़ भाग रहा था. मैं देख रहा था पाकिस्तानी रेंजरों की बंदूकें मेरी तरफ़ तनी हुई थीं. मैं चिल्ला रहा था, “मैं एक भारतीय हूँ, मुझे अंदर आने दो. मैं बाकी बातें अंदर आकर समझाता हूँ, मुझे मत मारो.” यह बात 1997 की है. अब तो भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की हवा बह रही है और वाघा सीमा के आरपार दूसरी बस की सहमति बन गई है लेकिन वह दूसरा ज़माना था. भारत और पाकिस्तान, दोनों ही अपनी आज़ादी की पचासवीं सालगिरह मना रहे थे. जुलाई के महीने में इसी पर एक ख़ास कार्यक्रम तैयार करने के लिए बीबीसी टीवी टीम के साथ मैं पाकिस्तान गया हुआ था. मेरे साथ दो अंग्रेज़ थे, एक प्रोड्यूसर और एक कैमरामैन. इस घटना के एक दिन पहले हमने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के आलीशान सरकारी निवास में उनका साक्षात्कार किया था. उसके बाद ही हमें पता चला कि अगले दिन शाम हमें भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी से भी साक्षात्कार का समय मिल गया है. हमें तत्काल दिल्ली पहुँचना था पर उस समय लाहौर से दिल्ली के लिए हवाई सेवा हर दिन नहीं थी. हमें पता था कि भारतीयों और पाकिस्तानियों को वाघा से सीमा पार करने की अनुमति नहीं है लेकिन दिल्ली समय से पहुँचने के लिए कोई और चारा नहीं था. इसलिए मैने पैदल ही वाघा पर अपनी क़िस्मत आजमाने का फ़ैसला किया. जद्दोजहद वाघा लाहौर से थोड़ी ही दूरी पर है और सुबह-सुबह हम वहाँ पहुँच गए.
वहाँ अधिकारी को मैंने बताया, “कल शाम हमने आपके प्रधानमंत्री का साक्षात्कार किया था और आज शाम हमें भारतीय प्रधानमंत्री से मिलना है. हमें पता है कि हम आपसे जो अनुरोध कर रहे हैं, वो ग़ैरकानूनी है, पर देखिए, यह मौका दोनों ही देशों की सालगिरह का है” और फिर आश्चर्यजनक रूप से उस अधिकारी ने हमारी बात मान ली और हमें वाघा की सीमा पार करने की अनुमति दे दी. वैसे भी मेरे दोनों साथियों के लिए वैसे भी कोई दिक़्क़त नहीं थी क्योंकि ब्रितानी नागरिक होने के नाते वाघा से सीमा पार करने में उनके लिए कोई रोक नहीं थी. उस अधिकारी ने मुझसे कहा, "हम तो आपको जाने दे रहे हैं पर देखिए, आपके लोग आपको अंदर लेते हैं या नहीं." मैं बिल्कुल निश्चिंत था. मुझे लगा कि अपने वतन पहुँच गए तो वहाँ के लोग मेरी बात समझेंगे ही. भारत की तरफ़ आते ही मैंने बीएसएफ़ के अधिकारी से बात करनी चाही. मैंने उस अधिकारी को अटलबिहारी वाजपेयी से साक्षात्कार की बात भी बताई. मैंने कहा, “देखिए पाकिस्तानियों ने मुझे इजाज़त दे दी है और अब तो ये अपने ही घर का मामला है.” लेकिन उन पर इसका कोई असर पड़ता नज़र नहीं आया. उनका फ़ोन ख़राब था और बार्डर पर मोबाइल फ़ोन भी नहीं चलते. तब मैंने उस अधिकारी से यह बताने की कोशिश की कि बीएसएफ़ के महानिदेशक मेरे अच्छे मित्र हैं और मैं उनके वरिष्ठ अधिकारियों से कश्मीर में मिल चुका हूँ. कश्मीर में भारतीय जवानों के साथ काम करने का अनुभव मुझे बता रहा था कि आशा मत छोड़ो और धैर्य से डटे रहो. न जाने चाय की कितनी ही प्यालियाँ खाली हो चुकी थीं. मुझे समय का अंदाज़ा ही नहीं रहा और अफ़सर अपने काम में व्यस्त हो गए. उस समय तो जैसे मैं आसमान से गिरा जब एक बीएसएफ़ के जवान ने मुझसे कहा कि चार बजने को पाँच मिनट रह गए हैं और पाँच मिनट में पाकिस्तानी अपनी गेट बंद कर देंगे. तब मैं न इधर का रहूँगा और न उधर का. डर मैं बौखलाया, मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ. मैंने उस अफ़सर को आख़िरी बार टटोलना चाहा जिनसे मैंने सुबह बात की थी पर वो आसपास नज़र नहीं आए. जैसे ही मैंने देखा कि पाकिस्तानी रेंजर अपना गेट बंद कर रहे हैं, मैं उनकी तरफ़ भागने लगा. मैं देख रहा था कि पाकिस्तानी रेंजरों की बंदूकें एक-एक कर मेरी तरफ़ तनती जा रही थीं. पर किसी ने मुझपर गोली नहीं चलाई. वो अधिकारी, जिन्होंने सुबह मुझे इजाज़त दी थी, अब भी मौजूद थे. उन्होंने मेरे पासपोर्ट पर सुबह की गई एँट्री को निरस्त किया और कहा, “मैंने कहा था न, अब सोचिए अगर ये आपके साथ ऐसा सलूक करते हैं तो हमारे साथ इनका सलूक कैसा होगा.” लाहौर जाने वाली आख़िरी बस तब तक जा चुकी थी. उसी अधिकारी ने मुझे एक गाड़ी मुहैया कराई. मैं "शत्रु" देश में वापस पहुँच चुका था पर पहली बार, न जाने क्यों डर सा नहीं लगा. |
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