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बुधवार, 20 अप्रैल, 2005 को 23:37 GMT तक के समाचार
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ग़रीबी की मार से आँख बेचने को मजबूर
शेफ़ाली बेगम
शेफ़ाली के लिए दो जून की रोटी के लाले पड़े हुए हैं
बांग्लादेश में ग़रीबी से बदहाल एक महिला ने रोज़ी-रोटी चलाने के लिए अपनी आँख बेचने के लिए विज्ञापन दिया है.

कुछ दिन के लिए ग़रीबी से निजात पाने का उसे एक यही तरीक़ा नज़र आया है.

शेफ़ाली बेगम नाम की यह महिला अपनी ढाई साल की बेटी के साथ ढाका में रहती है. अगर उसे घर कहा जा सके तो वो बांस और टीन की छत वाला एक बहुत ही छोटा सा एक ढाँचा भर है.

गृहस्थी के नाम दो चार बरतन है और एक कंबल. इतनी ग़रीबी और बदहाली से निजात पाने के लिए 26 वर्षीय शेफ़ाली बेगम ने अपनी एक आँख बेचने का फैसला किया है.

एक बडे अख़बार में इस बाबत उन्होने विज्ञापन दिया है और ख़रीदार की राह तकती शेफ़ाली बेगम कहती हैं कि अपनी बेटी को पालने-पोसने के लिए उनके पास कोई ज़रिया नहीं है.

डॉक्टरों ने चिंता जताई है कि शेफ़ाली बेगम के इस क़दम से और लोग भी इसी राह पर चल सकते हैं. फिलहाल किसी ने शेफ़ाली बेगम के विज्ञापन का जवाब नहीं दिया है.

नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी ने जीते-जी अपनी आँख बेचने की मंशा ज़ाहिर की है. आमतौर पर किसी की मौत के बाद ही उसकी आँख किसी दूसरे को दी जा सकती है.

शेफ़ाली कहती हैं कि कमरतोड़ ग़रीबी से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने ये फैसला लिया है ताकि अपनी बेटी के लिए दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम तो कर सकूँ.

"चार साल पहले जब मेरी शादी हुई थी तब तक सब ठीक था लेकिन एक महीना पहले मेरा पति न जाने कहाँ चला गया. मेरे पास कोई सहारा नहीं है."

शेफ़ाली कहती हैं, "मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूँ इसलिए मुझ अकेली महिला को भला कहाँ कोई काम मिल सकता है. मैं सिर्फ़ इतना चाहती हूँ कि मुझे कुछ धन मिल जाए ताकि मैं अपनी बेटी का पेट पाल सकूँ."

शेफ़ाली बेगम पढ़ी-लिखी नहीं हैं और शायद इसीलिए ये भी नहीं जानतीं कि बांगलादेश में किसी भी अंग को बेचना ग़ैरकानूनी है.

लेकिन क्या कोई यह सोचता है कि किसी भी देश में भूखे पेट सोना गैरकानूनी क्यों नहीं होता?

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