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वामपंथ पर खुली अर्थव्यवस्था का दबाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय राजनीति में आज वामपंथी दल अचानक केंद्रीय भूमिका में आ गए हैं. बीते काफ़ी समय से हावी जाति और धर्म जैसे भावनात्मक मुद्दों का गुबार छंटते ही ऐसा हुआ है. अचरज नहीं कि वे इस भूमिका के लिए तैयार नहीं लगते और कुल मिलाकर वे कभी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर या भूमंडलीकरण के विरोध के नाम पर “शोषित” हो रहे हैं. ख़ुद उनकी निष्ठा, अभी तक सामान्य राजनीतिक गिरावटों से दूर रहने की उनकी काबिलियत या फिर भावनात्मक मुद्दे की जगह एक अर्थ में पूर्ण राजनीति करने की ज़िद जैसे उनके गुण अपनी जगह हैं और उनका आदर किया जाना चाहिए. पर जब कुल वामपंथी राजनीति का मतलब उदारीकरण-भूमंडलीकरण के हर अच्छे-बुरे क़दम का अंध विरोध हो जाए या फिर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुछ भी करने वालों की राजनीति का समर्थन करना बन जाए तो मुश्किल हो जाती है. आज वामपंथी दलों का काफी कुछ मतलब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) हो गया है जिसकी दो राज्यों में सरकारें हैं और जो कुल चुने हुए वामपंथी जनप्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) में दो तिहाई से ज़्यादा हिस्सा रखती है. आज माकपा का लोकसभा अध्यक्ष भी है. लेकिन मामला इस गिनती और प्रभुत्वकारी हिस्से भर का नहीं है. वामपंथी दलों की नीतियों पर भी माकपा की साफ़ पकड़ दिखती है और अब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, फारवर्ड ब्लाक, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी जैसी छोटी पार्टियों की तरफ से उठने वाला प्रतिरोध भी कमतर होता जा रहा है. आज हालात यह हो गई है कि भाकपा के नेता दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के विलय की वकालत करते हैं और माकपा इस सवाल पर बात करने को तैयार नहीं है. पर मसला यह नहीं है. पूरा का पूरा वाममोर्चा अपनी राजनीति और कार्यनीति में जिन मात्र दो बिंदुओं पर सिमट आया है. वह है भाजपा विरोध के नाम पर बाक़ी किसी को भी समर्थन करना और उदारीकरण-भूमंडलीकरण के नाम पर उठने वाले हर क़दम का विरोध करना. अब इनमें से पहली रणनीति ने खुद उनका और मुल्क़ का कितना नुक़सान किया है, इस विस्तार में जाने की फ़िलहाल ज़रूरत नहीं है. 'कर्मकांड' इधर उदारीकरण का उनका विरोध भी बहुत कुछ कर्मकांड बन कर रह गया है. केंद्र में शासन कर रहे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में वे भागीदार नहीं हैं पर केंद्र सरकार को वे एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर समर्थन दे रहे हैं. यह अच्छी बात है और वामपंथी दलों के समर्थन में इससे भी अच्छी बात है कि वे इसकी कोई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष क़ीमत नहीं वसूल रहे हैं. वे किसी व्यावसायिक लाँबी की पिछले दरवाजे से वकालत करते हों, यह बात सोची भी नहीं जा सकती. जबकि आज की भारतीय और विश्व राजनीति में ऐसी लॉबिंग एक सच्चाई है. पर जब यह ईमानदारी और ऐसा अंध समर्थन (भाजपा को सत्ता से दूर रखने के उद्देश्य से) एक कर्मकांड का रूप ले ले तो यह न सिर्फ़ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि राजनीति के लिए भी नुक़सानदेह है. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने भी भूमंडलीकरण-उदारीकरण की असफलताओं को, गाँव-देहात-पिछड़े इलाक़ों-बेरोजगारों की सुध न लेने को मुद्दा बनाया था. कांग्रेस के अंदर भी भूमंडलीकरण विरोधी लॉबी है. पर सत्ता में आने के बाद उसने अपने सुर बदले हैं और उदारीकरण के जनक डॉ मनमोहन सिंह को सरकार की बागडोर पकड़ाकर स्पष्ट संकेत भी दे दिए हैं. मुश्किलें वामपंथी दलों को तब मनमोहन-चिदंबरम की जोड़ी के चुनाव पर आपत्ति नहीं हुई. उनको प्रधानमंत्री-वित्त मंत्री बनाने में कुछ गड़बड़ नहीं दिखी, पर उनके हर क़दम में गड़बड़ दिखने लगी है. उदारीकरण के फैसलों के लिए जो स्थितियाँ जबावदेह थीं उनके लिए वामपंथी राजनीति और नीतियाँ एक हद तक जिम्मेदार हैं. और आम वामपंथी दल जो कर रहे हैं, उनसे यही बात सामने आ रही है कि इन नीतियों का कोई विकल्प नहीं है. अगर आज आप किसी क्षेत्र में विदेशी पूँजी निवेश की सीमा 25 फीसदी रखना ठीक मानते हैं तो कल 49 फीसदी और परसों 74 फीसदी भी ठीक मान लेंगे, यह साफ़ लगता है. असल में मार्क्सवाद या पूरा का पूरा वामपंथी आंदोलन विकास के जिस मॉडल को आज भी मानता है उसकी कुल दिशा भूमंडलीकरण वाली मौजूदा दिशा से बहुत अलग नहीं है. उसमें सिर्फ़ निजी स्वामित्व हो या सरकार या उसके बहाने पार्टी का इसमें फर्क़ है. जब सरकार या पार्टी के संचालन वाला मॉडल सारी दुनिया में निजी संचालन की तुलना में असफल हो गया है तो उसकी वकालत का कोई मतलब नहीं बचता है. और भारी तकनीक, बड़े पूँजीनिवेश का मॉडल चलना है तो ग़रीब मुल्कों के पास दूसरा विकल्प ही नहीं है. स्वयं वामपंथी प्रभाव ने भी सार्वजनिक क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को जिस हालत में पहुँचाया उसने भी उदारीकरण की ज़रूरत बनाई. अब भूमंडलीकरण और उसके नतीज़ों को लेकर बहस की जा सकती है. बीते समय के कोटा-परमिट राज तथा लालफीताशाही की समाप्ति ज़रूरी थी इस पर कोई बहस नहीं हो सकती. वामपंथी दलों की केंद्रीय भूमिका स्वयं उनके लिए कई तरह की मुश्किलें ला रही है. ऐसा सिर्फ़ आर्थिक नीतियों के मामले में नहीं है - ऐसा कुल राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मामले में भी है. वामपंथी दलों को अपनी इस भूमिका से आगे और मुश्किलें पेश आएँगी. उन्हें पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल में उसी कांग्रेस से लड़ना है जिसे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वे समर्थन दे रहे हैं. भले ही ऐसी वकालत करने वाले सैफुद्दीन चौधरी जैसे उदीयमान नेता आज कुड़ेदान में फेंक दिए गए हों. |
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