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रविवार, 20 फ़रवरी, 2005 को 13:38 GMT तक के समाचार
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वाम का झंडा, कहीं गरम कहीं ठंडा

वामपंथी
बिहार में वामपंथी दल लालू यादव की पार्टी के साथ हैं
हर बार की तरह इस बार भी बिहार और झारखंड में चुनाव की मुख्यधारा से थोड़ा हटकर एक और नारा सुनाई देता है, ‘जब लाल लाल लहराएगा...’ और तुरंत जनकवि नागार्जुन की कविता याद आ जाती है, ‘क्या लाल, क्या लाल’.

दिखाई भी कुछ ऐसा ही देता है. बिहार सहित झारखंड के तमाम इलाक़ों में लाल झंडा भी दिखा और साइकिल या पैदल ही झंडा लेकर चलते हुए वामपंथी भी.

ये तेवर कहीं गरम थे तो कहीं नरम यानी इन शांतिपूर्ण प्रचार के तरीक़ों के अलावा गिरीडीह, रामगढ़ के तमाम गाँवों में प्रशासन के ख़िलाफ़ मकानों पर लिखे नारे और माओवादी चेतावनियाँ भी देखने को मिलीं.

पर गंभीर बहस, सस्ते चुनावी अभियान और तमाम ज़मीनी सवालों के बावजूद वाम का नाम हाशिए पर ही है.

हालांकि तमाम राजनीतिक दल राज्य में इन्हें प्रतिद्वंदी नहीं मानते पर इनका मानना है कि इस बार विधानसभा में इनकी तादाद में सुधार होगा और सरकार बनाने में इनकी भी भूमिका हो सकती है.

कौन से लाल

वामपंथ की मशाल लिए चल रहे एक जुलूस से हमारी बेगूसराय के रास्ते में मुलाकात हो गई. पूछा, कौन से वामपंथी दल के है तो किसी ने बताया कि ये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी वाले हैं. हम जुलूस के पास गए और लोगों से बातचीत की.

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कई इलाक़ों में वामपंथियों का प्रभाव भी है

उन्होंने बताया कि वो राज्य की क़ानून व्यवस्था को लेकर ख़ासे चिंतित हैं और इसबार एक साफ़ प्रशासन देने के वादे पर लोगों से वोट माँग रहे हैं.

कुछ देर तक राज्य पर गरमा-गरम चर्चा चलती रही पर वहाँ बात ज़्यादा देर नहीं ठहरी और सवाल केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों पर आकर अटक गया.

हमने पूछा कि क्या क्षेत्र में काम कर रहे वामपंथी इस वर्तमान सरकार की नीतियों से ख़ुश हैं तो उनमें से एक ने कहा, "आर्थिक नीतियों के सवाल पर तो भाजपा और काँग्रेस में कोई फ़र्क नहीं है पर मुद्दा सांप्रदायिकता और जातिवाद का है."

पार्टी के एक स्थानीय नेता ने बताया, "राज्य में अगर यूपीए के नेतृत्व वाली सरकार बनने की नौबत आती है तो केंद्र की ही तरह यहाँ भी समर्थन देंगे."

कब लहराएगा

बेगूसराय शहर का नज़ारा कुछ दूसरा ही था. नीचे लाल झंडा लगाए साइकिल जुलूस निकल रहा था और ऊपर हवा में किसी बड़ी पार्टी के नेता का उड़नखटोला.

 आर्थिक नीतियों के सवाल पर तो भाजपा और काँग्रेस में कोई फ़र्क नहीं है पर मुद्दा सांप्रदायिकता और जातिवाद का है
वामपंथी समर्थक

केवल शहर ही नहीं, बल्कि राज्य के तमाम हिस्सों में मिट्टी में वाम की महक तो आई पर मानने और जानने वालों की तादाद इतनी नहीं है कि राज्य की राजनीति के ठीकरे को ठोकर भी लगा सकें.

राज्य में वाम की स्थिति पहले तो ऐसी नहीं थी. दो दशक पहले के दौर को देखें तो राज्य में वामदलों का ख़ासा सामाजिक प्रभाव था और राजनीतिक दख़ल भी. विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों के लिए वामपंथी आंदोलन एक अहम भूमिका निभा सकता था पर ऐसा नहीं हुआ.

राज्य में वर्ग संघर्ष का जातीय संघर्ष में बदलना इसकी एक वजह हो सकती है. कुछ लोग इस दौरान वामदलों में मुद्दों पर हावी होती जातीयता को भी इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं.

पश्चिम बंगाल से सटे होने के बावजूद दोनों ही राज्यों से वाम का नारा, मुख्यधारा से बाहर ही है. कारण क्या रहे, राज्यों की अपनी सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियाँ या फिर वामपंथी दलों की अपनी समझ, यह अभी समझ से परे ही है.

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