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मौत के ढेर में बची ज़िंदगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहते हैं कि मौत का शिकंजा बहुत मज़बूत होता है और इससे बच निकलना नामुमकिन होता है लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है की ज़िंदगी इस शिकंजे को ढीला कर देती है. बिल्कुल ऐसा ही हुआ है सूनामी लहरों से हुई तबाही के शिकार एक व्यक्ति के साथ जब उसकी ज़िंदगी ने मौत को चकमा दे दिया. इसे चकमा ही कहा जाएगा क्योंकि पूरे गाँव में इस तबाही से बचने वाला वह सिर्फ़ अकेला ही है. हिंद महासागर में सूनामी की लहरों की चपेट में आकर बह जाने के चार हफ़्ते बाद अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के एक युवक को जीवित पाया गया है. माईकल मंगल नाम के इस युवक को निकोबार द्वीप समूह के एक द्वीप पर अकेले पाया गया. उसे भारतीय नौसेना ने बचाया. उसने बताया कि जब सूनामी की लहरें उठनी शुरु हुईं तो वह उनमें बह गया लेकिन फिर वह किनारे तक पहुँचने में कामयाब रहा. उसने पाया कि अपने पूरे गाँव में जीवित बचने वाला वह अकेला व्यक्ति था. पिलो पाँजा नाम के द्वीप पर फँसे मंगल ने पाया कि लगभग आधा द्वीप पानी में डूबा हुआ है. वे नारियल का पानी पीकर और उसकी गिरी खाकर जीवित रहे. फिर उन्होंने अपने कपड़ों को एक बाँस पर बाँधा और इसे लहरा रहे थे जब उस द्वीप के पास से गुज़रती नौसेना के एक जहाज़ ने उन्हें देखा और उन्हें बचा लिया. अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के लगभग 1900 लोगों के सूनामी की चपेट में आकर मारे जाने की घोषणा की गई है लेकिन लगभग 5500 लोग अब भी लापता है. |
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