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शुक्रवार, 12 नवंबर, 2004 को 07:35 GMT तक के समाचार
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शंकराचार्य 15 दिन की हिरासत में
शंकराचार्य
शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती पर मंदिर के एक कर्मचारी की तीन महीने पहले हुई हत्या में लिप्त होने का आरोप है
काँची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को हत्या और आपराधिक षडयंत्र के एक मामले में 15 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.

तमिलनाडु पुलिस के एक विशेष दल ने शंकराचार्य सरस्वती को गुरूवार रात को आंध्र प्रदेश के महबूबनगर ज़िले में गिरफ़्तार किया था.

तमिलनाडु पुलिस शुक्रवार को उन्हें एक विशेष विमान से चेन्नई लेकर आई और शुक्रवार सुबह उन्हें चेन्नई के पास काँचीपुरम में एक मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया.

मैजिस्ट्रेट ने शंकराचार्य को 26 नवंबर तक के लिए न्यायिक हिरासत में रखने का निर्देश दिया.

इसके बाद शंकराचार्य को वेल्लोर के केंद्रीय कारागार ले जाया गया है.

शंकराचार्य की ज़मानत की अर्ज़ी पर चेन्नई उच्च न्यायालय में शनिवार को सुनवाई होगी.

उनके वकील ने शंकराचार्य को जेल में नहीं रखकर किसी घर में हिरासत में रखने की अपील की थी मगर अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया.

मामला

शंकराचार्य सरस्वती पर कांचीपुरम के एक मंदिर के एक कर्मचारी की हत्या में लिप्त होने का आरोप लगाया है.

शंकररामन नामक इस कर्मचारी की हत्या सितंबर में तमिलनाडु के कुड्डलोर नामक जगह पर की गई थी.

इस मामले में पाँच लोगों ने कुछ दिन पहले पुलिस के सामने समर्पण किया था.

उन्होंने अपने बयान में ये कहा कि शंकराचार्य सरस्वती और उनके बड़े भाई इस हत्या से जुड़े हुए हैं.

शंकराचार्य

शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ़्तारी से भारत में एक नई सनसनी फैल गई है क्योंकि भारत में हिंदू मतावलंबियों में शंकराचार्य काफ़ी महत्वपूर्ण माने जाते हैं.

पिछले दिनों उनका नाम बाबरी मस्जिद विवाद के हल के सिलसिले में प्रमुखता से सुर्खियों में आया था.

उन्होंने इस सिलसिले में मध्यस्थता करने की कोशिश की थी मगर मुस्लिम समुदाय की ओर से इस आरोप के बाद वे पीछे हट गए कि शंकराचार्य हिंदू खेमे का पक्ष ले रहे हैं.

पिछले वर्ष ही काँची पीठ के शंकराचार्य बनने के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक भव्य समारोह हुआ था जिसमें शामिल होनेवाले गण्यमान्य अतिथियों में भारत के राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम भी शामिल थे.

काँची कामकोठी पीठ का 69 वाँ शंकराचार्च बनने से पहले जयेंद्र सरस्वती का असली नाम सुब्रहमन्यम था.

1983 में जयेंद्र सरस्वती ने शंकर विजयेंद्र सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था.

शंकराचार्य के भक्तों में नेपाल का राजपरिवार भी शामिल है और वे अक्सर नेपाल की यात्रा करते रहे हैं.

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