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शुक्रवार, 01 अक्तूबर, 2004 को 01:08 GMT तक के समाचार
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भोपाल जैसे गैस हादसे की आशंका

गजरौला में प्रदूषण से प्रभावित फ़सलें
फ़ैक्टरियों से निकला पानी फ़सलें सुखा देता है
बीस साल गुज़रने के बाद भी भोपाल गैस काँड के प्रभावितों की पीड़ा पूरी तरह से दूर नहीं है और एक और औद्योगिक क्षेत्र ऐसा है जहाँ कभी भी ऐसी ही गैस दुर्घटना हो सकती है.

ये है उत्तर प्रदेश का तीसरे स्थान पर आने वाला औद्योगिक क्षेत्र-गजरौला जो दिल्ली से लखनऊ जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-24 पर स्थित है.

दिल्ली से रेल या बस के ज़रिए जैसे ही आप गजरौला के नज़दीक आते हैं तो नाक पर हाथ रखना होता है क्योंकि वहाँ तरह-तरह के रसायनों और गैसों का प्रयोग करने वाली फ़ैक्टरियों से ऐसी बदबू निकलती है जिसे बर्दाश्त करना मुश्किल होता है.

बात यहीं ख़त्म नहीं होती बल्कि असली चिंता यहाँ से शुरू होती है. यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इन फ़ैक्टरियों ने न सिर्फ़ आसपास के लोगों की ज़िंदगी में ज़हर घोल दिया है बल्कि खेतों की मिट्टी को ही ज़हरीला बना दिया है.

इन औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली ज़हरीली गैसों से यहाँ कभी भी भोपाल जैसा गैस हादसा हो सकता है.

ये फ़ैक्टरियाँ गजरौला और आसपास के क्षेत्र में दोहरी मार कर रही हैं - एक तो धुएँ के ज़रिए हवा में भारी प्रदूषण और ज़हरीली गैसें छोड़ रही हैं और दूसरी तरफ़ इनसे निकलने वाला पानी यहाँ की मिट्टी से फ़सलों को छीनता जा रहा है.

यहाँ फ़ैक्टरियों से निकले वाले पानी में फ्लोराइड, क्लोराइड, आयोडाइड, नाइट्राइट जैसे हानिकारक तत्व भारी मात्रा में हैं.

ख़तरा बढ़ रहा है

बॉटेनिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के पूर्व वैज्ञानिक और पर्यावरणविद डॉक्टर वीएस अग्रवाल गजरौला में बिगड़ते पर्यावरण संतुलन को बेहद भयावह मानते हैं और कहते हैं कि इन कारख़ानों से निकलने वाली गैसें स्थानीय लोगों की सेहत पर ख़तरनाक हद तक असर डाल रही हैं.

कुछ साल पहले उन्होंने गजरौला के आसपास की हवा और पानी के कुछ नमूने लिए थे जिनके मुताबिक़ हवा में आठ प्रतिशत तक प्रदूषण पाया गया था और इस प्रदूषण से क़रीब पाँच किलोमीटर तक की परिधि का इलाक़ा प्रभावित हो रहा है.

फ़ैक्टरियों से प्रदूषित नदियाँ
फ़ैक्टरियों का पानी नदियों को भी प्रदूषित कर रहा है

डॉक्टर अग्रवाल इलाक़े के लोगों के स्वास्थ्य का अध्ययन करने के बाद इस नतीजे पर पहुँचे कि ज़्यादातर लोग साँस की किसी ना किसी बीमारी से ग्रस्त हैं और पानी में फ्लोराइड घुल जाने की वजह से लोगों की हड्डियाँ कमज़ोर होती जा रही हैं जिससे युवा भी बहुत जल्दी ही बुढ़ापे की दहलीज पर पहुँचते जा रहे हैं.

गजरौला निवासी डॉक्टर धीरेंद्र सिंह कहते हैं कि फ़ैक्टरियों से निकलने वाली राख लोगों के फेफड़ों पर बुरा असर डाल रही है साथ ही उसका असर त्वचा पर भी होता है जिससे चर्म रोग भी फैल रहा है.

एक फ़ैक्टरी के सामने साइकिल मरम्मत की दुकान चलाने वाले शमशेर आलम कहते हैं कि उनकी एक आँख फैक्टरी से निकलने वाली राख की वजह से ही ख़राब हो गई.

मवेशी भी

इस प्रदूषण से क़रीब 100 गाँवों के किसान ही नहीं मवेशी भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं.

पंतनगर विश्वविद्यालय के पर्यावरण वैज्ञानिक आरके सिंह ने कुछ दिन पहले अपनी जाँच रिपोर्ट में कहा था कि गजरौला में हर दिन क़रीब 100 मीट्रिक टन कोयला प्रयोग में लाया जाता है जिससे अत्यधिक मात्रा में सल्फ़र डाई ऑक्साइड गैस निकलती है.

एक प्रमुख फ़ैक्टरी ज़ुबीलेंट ओर्गेनॉसिस प्रबंधन इन आरोपों को निराधार बताता है.

ज़ुबीलेंट ऑर्गेनॉसिस के एक प्रबंधक आरएस झाला कहते हैं कि पानी को वैधानिक विधि के ज़रिए कृषि योग्य बनाकर ही नदी में छोड़ा जाता है लेकिन मौक़े पर मौजूद हालात कुछ और ही कहानी बयान करते हैं.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को की गई शिकायत के बाद 1996 में कई गाँवों से पानी के नमूने लिए गए थे जिनकी जाँच के बाद कहा गया था कि यहाँ का पानी क़तई पीने के लायक नहीं है.

इस जाँच रिपोर्ट को देखते हुए 1996 में 17 सदस्यों की एक संसदीय उपसमिति का गठन किया गया था जिसने गजरौला का दौरा करके हवा, पानी और मिट्टी के नमूने एकत्र किए थे लेकिन वे चोरी हो गए.

गजरौला
फ़ैक्टरियों के मालिक मानने को तैयार नहीं हैं कि प्रदूषित पानी नदियों में जा रहा है

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के सदस्य मुजाहिद चौधरी बताते हैं कि 2002 में एक पत्र के ज़रिए उन्हें सूचित किया गया था कि संसदीय उपसमिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है लेकिन उस पर कुछ कार्रवाई आज तक नहीं हुई है.

प्रदूषण मुक्ति संघर्ष समिति के अध्यक्ष अरविंद शर्मा क़रीब एक दशक से इस पर्यावरण संकट के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं. उनका आरोप है कि इस मामले में ख़ुद सरकार और प्रशासन ही आँखें मूँदे बैठे हैं.

अरविंद शर्मा कहते हैं कि इन फैक्टरियों से होने वाले प्रदूषण से लोगों की फ़सलें चौपट हो जाती हैं और सरकार से उन्हें कोई मुआवज़ा भी नहीं मिलता.

इलाक़े में पहले व्यापक क्षेत्र में आम के बाग थे लेकिन फैक्टरियों से निकले वाले धुएँ की वजह से ज़्यादातर बाग बेकार हो गए और उनपर फल आने बंद हो गए.

स्थानीय लोगों की चिंता है कि अगर समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो उनका जीवन धीरे-धीरे न सिर्फ़ नरक बनता जा रहा है बल्कि कभी भी भोपाल जैसा गैस हादसा हो सकता है.

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