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रौनक लौटने लगी है गुलमर्ग में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया के सबसे ऊँचे बर्फ़ीले क्षेत्रों में से एक गुलमर्ग कश्मीर की ख़ूबसूरती दूर से ही झलकाता है. लेकिन एक लंबे अरसे से कश्मीर में चल रहे ख़ूनख़राबे की वजह से इस ख़ूबसूरती को ग्रहण लगा हुआ था. अब गुलमर्ग में वही पुरानी रौनक दिखती है. पर्यटक लौट रहे हैं तो लोगों को लग रहा है कि उनका जीवन भी सामान्य हो रहा है. गुलमर्ग की वादियों का आनंद अब समान्य पर्यटक ही नहीं, तीर्थ पर्यटक यानी अमरनाथ यात्री भी ले रहे हैं. हर साल हज़ारों की संख्या में यात्री पहलगाम होते हुए अमरनाथ पहुंचते हैं और तीर्थ पूरा करके गुलमर्ग का रुख़ कर लेते हैं. वैसे तो पहलगाम अपने आप में बहुत ख़ूबसूरत जगह है लेकिन सैलानियों को अपनी तरफ़ खींचने के लिए गुलमर्ग के पास और कई कारण हैं क्योंकि वहाँ जून-जुलाई में भी बर्फ़ नज़र आ जाती है. ऐसे ही कुछ यात्रियों से मेरी मुलाक़ात हुई गुलमर्ग में. उन्होंने बताया, "गुलमर्ग वाक़ई बहुत सुंदर है, बहुत मज़ा आ रहा है. यहाँ एक मंदिर है जहाँ 'जय-जय शिव शंकर' वाले गाने की शूटिंग हुई थी, हमने सोचा की चलो देखकर आते हैं." ऐसे ही एक अन्य यात्री ने बताया, ''मैं पिछले छह-सात साल से आ रहा हूँ, पहले साढ़े सात बजे तो यहाँ कोई नहीं दिखाई देता था, आज ऐसा लग रहा है कि हजारों आदमी होंगे. अगले साल शायद और भी अच्छा लगेगा. दुख होता है कि इतनी बढ़िया जगह इतनी मुश्किल से देखने को मिली है." यहीं हमारी भेंट एक अमरनाथ यात्री से भी हो गई. वो बताते हैं, "बहुत बढ़िया दर्शन हुए. कोई परेशानी नहीं हुई रास्ते में. हम ये सोच रहे थे कि आतंकवादी कैसे होते हैं. पर यहाँ कोई डर दिमाग में नहीं आया. हमें तो सिर्फ अमरनाथ की यात्रा करनी है, यही मन था. दर्शन हो गए." पर्यटन उद्योग स्थिति सामान्य हो रही है तो लगता है कि पर्यटन उद्योग भी शायद अपनी पुरानी स्थिति में लौट सकेगा और रोज़गार की समस्या भी कुछ हद तक दूर हो सकेगी.
गुलमर्ग में पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखकर होटल उद्योग भी काफ़ी ख़ुश है. सरकारी आँकड़ों के मुताबिक 2002 में जहाँ केवल 20 हज़ार पर्यटक आए थे वहीं 2003 में यह संख्या एक लाख 50 हज़ार तक पहुँच गई. अब्दुल रशीद होटल उद्योग में 1966 से हैं. इस उद्योग में एक बुरा दौर देख चुके रशीद कहते हैं, "हमने पहले लोगों को लुभाने के लिए पैकेज टूर भी बनाए लेकिन कोई तैयार नहीं होता था यहाँ आने के लिए, लेकिन अब पर्यटन जीवित हो रहा है. दो महीने से ठीक काम था. अभी 40 प्रतिशत है, जो अच्छा है इंशाअल्लाह और बढ़े." गुलमर्ग की पहाड़ियों में घोड़े की टाप भी अब साफ़ सुनाई देती है. मंज़ूर 20 साल के हैं. पर्यटकों को गुलमर्ग की वादियों से वाकिफ़ कराना उन्होंने अपने बाबा से सीखा है. वे चार साल से आर्थिक तंगी का सामना कर रहे थे. लेकिन परिवार वालों के लिए अब मंज़ूर की पोटली में भी कुछ है. वो ख़ुशी-ख़ुशी बताते हैं, "पहले सौ-डेढ़ सौ रुपए कमाता था, लेकिन अब रोज़ साढ़े तीन-चार सौ रूपए तक मिलते हैं. मैं चाहता हूँ कि सैलानी आएँ, इससे घर का ख़र्चा चल जाता है. सैलानी ही हमारी खेती-बाड़ी हैं." बहुत साल बाद जम्मू-कश्मीर में पर्यटन विभाग को 1986 का वक़्त याद है.
1986 में लगभग आठ लाख पर्यटक आए थे. यही स्थिति 1998 में हुए चुनाव के बाद भी एक बार आई थी. लेकिन इसके बाद करगिल युद्ध के कारण पर्यटन विभाग इस आँकड़े तक नहीं पहुँच पाया. लेकिन उन्हें उम्मीद है कि इस साल यह आँकड़ा पार किया जा सकेगा. उनका मानना है कि पिछले चौदह साल के मुक़ाबले इस बार काफ़ी सैलानी आ रहे हैं. कश्मीर में एक दशक से चल रहे ख़ूनख़राबे और गोलाबारूद से बदरंग हुई ज़िंदगी में फिर से रंग भरने में अब युवा भी आगे आ रहे हैं ताकि लोग अतीत की काली परछाई को भुलाकर अपने सुनहरे भविष्य को संजोने की कोशिश कर सकें. |
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