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सोरेन की अर्ज़ी पर सुनवाई नहीं हुई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में केंद्रीय कोयला मंत्री शिबू सोरेन की अग्रिम ज़मानत की याचिका पर गुरूवार को राँची हाईकोर्ट में सुनवाई नहीं हुई और वे गिरफ़्तारी से बचने के लिए लापता है. झारखंड से आई दो पुलिस अधिकारियों की टीम ने बुधवार को दिल्ली में शिबू सोरेन के घर जाकर गिरफ़्तारी वारंट पहुँचाया था मगर वे घर पर नहीं थे और पुलिस उनकी तलाश कर रही है. शिबू सोरेन ने अग्रिम ज़मानत के लिए झारखंड उच्च न्यायालय में अर्ज़ी दाख़िल की थी जिस पर गुरूवार को सुनवाई होनी थी. उनके वक़ील ने राँची उच्चन्यायालय से ये दलील देते हुए वारंट ख़ारिज़ करने की अपील की है कि ये मामला राजनीतिक है और इस मामले में शिबू सोरने के अलावा अधिकांश लोगों के ख़िलाफ़ मामला वापस लिया जा चुका है. झारखंड की जामताड़ा अदालत ने लगभग 30 साल पुराने एक मामले में शनिवार को शिबू सोरेन के ख़िलाफ़ ग़ैरज़मानती वारंट जारी कर दिया था. इसके बाद से ही शिबू सोरेन का पता नहीं है. मुद्दे ने राजनीतिक रंग पकड़ लिया है और विपक्ष सोरेन सहित उन सभी सांसदों के मुद्दे पर सरकार का संसद मे विरोध कर रही है जिनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज हैं. मामला झारखंड आँदोलन के प्रमुख नेता के ख़िलाफ़ ये मामला 1975 का है जब शिबू सोरेन की अगुआई में हो रही एक रैली में एक दूसरी जगह की ख़बर मिलने के बाद लोग हिंसक हो उठे और उन्होंने वहाँ जाकर मार-पीट की . इस घटना में 10 लोग मारे गए थे जिनमें नौ मुसलमान थे. शिबू सोरेन पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने उस भीड़ को उत्तेजित किया जिसने 11 लोगों को मार डाला था. उनमें 10 ऐसे मुसलमान थे जो ऐसी ज़मीनों पर बस गए थे जिसे आदिवासी अपनी बताते थे. लेकिन शिबू सोरेन का कहना है कि ये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और उन्हें ग़लत तरीक़े से निशाना बनाया जा रहा है. यह मामला कुछ साल पहले बंद कर दिया गया था लेकिन कुछ ताज़ा सबूत सामने आने के बाद इस मामले को फिर से खोला गया है. |
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