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नेपाली विपक्ष गतिरोध सुलझाने में नाकाम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल की प्रमुख विपक्षी पार्टियों की प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार चुनने के लिए बुलाई गई बैठक नाकाम रही. नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने सभी पार्टियों के सामने प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार के नाम का सुझाव देने का प्रस्ताव रखा था जिसके बाद विपक्षी पार्टियों ने बैठक की. तीन सप्ताह पहले नेपाल में महीनों तक चले विपक्ष के प्रदर्शनों के बाद देश के प्रधानमंत्री सूर्य बहादुर थापा ने इस्तीफ़ा दे दिया था जिसके बाद नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति की जानी बाक़ी है. विपक्षी पार्टियाँ नेपाल में संसद बहाल करने के लिए प्रदर्शन कर रही थीं. विपक्ष की मांग थी कि नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र 2002 में अपने हाथ में लिए हुए सारे अधिकार छोड़ दें और लोकतांत्रिक सरकार बहाल करें. नरेश का प्रस्ताव नेपाल नरेश ने विपक्षी पार्टियों को नया उम्मीदवार चुनने के लिए सोमवार शाम तक का वक़्त दिया था. राजमहल से जारी एक वक्तव्य में कहा गया था, "उम्मीदवार साफ छवि का होना चाहिए. उसे मंत्री परिषद का चुनाव करने के लिए सभी का समर्थन होना चाहिए और वह शांतिपूर्ण चुनाव की प्रक्रिया शुरू करने में सक्षम होना चाहिए." लेकिन सभी नेता नरेश के इस प्रस्ताव से खुश नहीं हैं. विपक्ष के नारायण मान बीजूकुच्छे ने रॉयटर्स न्यूज़ एजेंसी को बताया, "नेपाल नरेश ने सिर्फ विपक्ष की एकता तोड़ने के लिए ये क़दम उठाया है." स्थिति सूर्य बहादुर थापा ने सात मई को इस्तीफ़ा दे दिया था जिसके बाद से वहाँ कोई सरकार नहीं है. नेपाल नरेश ने अक्तूबर 2002 में नेपाल में सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे और विपक्षी पार्टियां तभी से नेपाल नरेश का विरोध कर रही थीं. नेपाल नरेश ने पहले उनके विरोध को नज़रअंदाज़ कर दिया था लेकिन हाल ही में उन्होंने विपक्षी नेताओं से मिलकर इस गतिरोध को हटाने की कोशिश की. लेकिन इस बैठक में कोई समझौता नहीं हो सका और दोनों के बीच अविश्वास और बढ़ गया है. इस पूरे संकट से केवल माओवादी आंदोलन को फायदा पहुंचा जो पिछले आठ सालों से देश में समाजवादी सरकार बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. |
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