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'गठबंधन की राजनीति में सामाजिक स्थायित्व ज़्यादा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश में एक पार्टी की सरकार से गठबंधन की सरकारों का जो परिवर्तन देश में आया है उसकी जड़ में आपात काल था. आपात काल में कांग्रेस ने अपने तमाम विरोधियों को एक ही रस्से में बांध दिया. उनकी अपनी पार्टी के अंदर विरोधी थे और दूसरी पार्टियों के भी विरोधी थे. कांग्रेस ने सबको एक जगह इकट्ठा कर दिया. अगर आपातकाल में कांग्रेस ने अगर यह रवैया न अपनाया होता, तो कई दफ़ा सोचता हूं कि गठबंधन की राजनीति का जन्म ही न हुआ होता. कांग्रेस ने न सिर्फ सबको इकट्ठा कर दिया, बल्कि सबको एक करके एक सैंद्धांतिक आधार दे दिया. फिर तीसरा उसने यह किया कि उसने सबको जेल में इकट्ठा रख दिया. तो फिर इनकी आपस में जो दुविधा थी, आपस में जो मुश्किलात थीं, वो इकट्ठे दो साल जेल में रहने में मिट गईं. एक दूसरे को वो व्यक्तिगत रूप में पहचानने लगे, जो पहले नहीं था. क्षेत्रीयता क्षेत्रीयता और मंडल कमीशन की रिपोर्ट ने भी गठबंधन की राजनीति को उभारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. क्षेत्रीयता असमानता तो पहले भी थी इसलिए क्षेत्रीय पार्टियां पैदा हो रही थी, लकिन तब वो पनपी नहीं थीं. क्षेत्रीयता असमानता न पैदा होती तो शायद क्षेत्रीय पार्टियां कभी जन्म न लेतीं. ये नामुमकिन था कि इतने बड़े देश क्षेत्रीयता असमानता न हो. हिन्दुस्तान आज़ादी के बाद शून्य से शुरु कर रहा था. गठबंधन की राजनीति के पीछे दूसरा कारण मंडल था. इससे देश में जो सामाजिक असामनता थी वो मुखर हो गई. इस रिपोर्ट के बाद लोगों को समझ आ गया कि उनके ख़िलाफ़ जात के नाम से भेदभाव होता है. होता तो पहले भी था लेकिन इस रिपोर्ट के बाद एक तरह की राजनीतिक जागृति आ गई. जब एनडीए का गठबंधन बना तो विपक्षी दलों ने उसका बहुत मज़ाक बनाया था. मज़ाक करना बड़ा आसान होता है. लेकिन देखा जाए तो मोरारजी देसाई की सरकार से लेकर आज तक हर सरकार गठबंधन की सरकार थी, कुछ लोग साफ़ स्वीकार कहते थे, कुछ लोग स्वीकार नहीं कहते थे. 19 के बाद मतदाताओं ने किसी एक पार्टी को बहुमत का जनादेश नहीं दिया था और न इस बार के परिणाम ऐसे हैं. देश में जिस तरह की विविधता है उससे तो लगता है कि अब देश में गठबंधन की ही राजनीति ही चलने वाली है. हां यह ज़रुर है कि कोई क्षेत्रीय पार्टी कभी एक तरफ जाएगी और कभी दूसरी तरफ. कांग्रेस ने सरकारें गिराईं एक दिलचस्प बात है कि जितने भी गठबंधन सरकारें बनी हैं आज तक कोई गठबंधन सरकार अपने भीतरी अंतर्विरोधों की वजब से नहीं गिरी. गिराने वाली हमेशा बड़ी पार्टी कांग्रेस थी, क्योंकि वो ये मान नहीं सकती थी कि गठबंधन सरकारें कामयाब हों. उनका गठबंधन में बिल्कुल बिश्वास नहीं था, अब चंद दिन पहले उन्होंने इस पर विश्वास दिखाया है क्योंकि उनकी अपनी मजबूरी है. लेकिन देश कई मील आगे निकल गया है. स्थायित्व जहाँ तक गठबंधन सरकारों की स्थिरता का सवाल है तो स्थायित्व किसको कहते हैं? अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पांच साल चल गई तो वह क्या स्थायी है, और कई दफा एक पार्टी की सरकार भी नहीं चलती. तो सरकार चलने की अवधि से स्थायित्व नहीं आता. स्थायित्व सामाजिक होता है और गठबंधन की सरकारें सामाजिक स्थायित्व ज़्यादा देती हैं. |
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