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सोमवार, 10 मई, 2004 को 10:23 GMT तक के समाचार
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जयललिता की सरकार से लोग नाराज़

वाजपेयी, आडवाणी के साथ जयललिता
एक बार फिर जयललिता ने भाजपा के साथ आने का फ़ैसला किया है
तमिलनाडु की 39 सीटों और पांडिचेरी की एक लोकसभा सीट में इस बार यदि विवाद रहा तो यही कि चुनाव के मुद्दे क्या हैं?

साढ़े चार वर्ष एनडीए का हिस्सा रही डीएमके ने जब अलग होने का फैसला लिया तो विश्लेषक उसे नम्बर नहीं दे रहे थे.

यह भी समझा जा रहा था कि अब भाजपा को खुलकर मौका मिल गया है अपने स्वाभाविक सहयोगी एआईडीएमके के साथ होने का.

लेकिन डीएमके के नेतृत्व वाले लोकतांत्रिक प्रगतिशील गठबंधन या डीपीए के गठन के बाद सामने गणित ने विश्लेषकों को अपने अनुमान पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया.

मुद्दे और गठबंधन

भाजपा और एआईडीएमके ने प्रयास किया है कि इस चुनाव में 'बड़े' और 'ऊंचे' मुद्दे उठा जाएं - जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा, केन्द्र में प्रधानमंत्री कौन हो, इत्यादि.

जयललिता ने विपक्ष की नेता सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर भाजपा से ज्यादा प्रचार किया है और डीएमके के गठबंधन को मौकापरस्त गठबंधन बताया है.

एआईडीएमके पार्टी जयजयलिता स्वयं चलाती हैं और उसकी व्यवस्था या ढांचे ने उनसे हट कर बहुत प्रचार नहीं किया.

जयललिता ने 'प्रथमार वाजपेयी' या प्रधानमंत्री वाजपेयी के नाम पर वोट मांगे हैं.

मशहूर फिल्म स्टार रजनीकांत ने पीएमके के खिलाफ तमिलनाडु के छह जिलों में लोगों से अपील की है और वाजपेयी का भी कुछ असर जरूर पड़ेगा ऐसी उम्मीद यह गठबंधन कर रहा है.

विपक्ष के सात दलों में डीएमके के अलावा कभी एनडीए सरकार में रही टी. रामदास की पट्टाली मक्कल कच्ची (पीएमके), वायको की एमडीएमके दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग शामिल हैं.

इन दलों की इस बार खूबी रही है- जोरदार प्रचार, डीएमके के कैडर का पूरी तरह इस्तेमाल और चुनाव को स्थानीय परेशानियों व जीवन स्तर पर केन्द्रित रखना.

जो काम कांग्रेस गठबंधन के लिए महाराष्ट्र में पेचीदा रहा क्योंकि वे राज्य में सरकार में हैं वही यहां आसान रहा है और पूरा प्रचार केन्द्र तथा राज्य सरकारों दोनों के खिलाफ रहा है.

राज्य सरकार के ख़िलाफ़

करुणानिधि
करुणानिधि की डीएमके ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है

हालांकि प्रचार के अंतिम में चार दिनों में यहां मूसलाधार बारिश हुई है - लेकिन कावेरी डेलटा में रह रहे किसान तीन वर्ष से सूखे की मार सहन कर रहे परेशान हैं.

जयललिता ने सरकार कर्मचारियों की हड़ताल पर कड़े रुख से उन्हें नाराज किया है. उन्होंने मुफ़्त बिजली दिए जाने की स्कीम को वापस ले लिया, वह भी चुनाव के ठीक पहले.

बाद में उन्होंने इस नीति को पलटने का ऐलान किया जरूर -लेकिन उनके द्वारा किसानों को वापस भेजी जाने वाली राशि अधिकतर किसानों को मिली ही नहीं.

जयललिता के शासन के दौरान-जैसी कि इस राज्य में परंपरा रही है - उन्होंने विपक्षी दलों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया.

साथ ही धर्मान्तरण के खिलाफ उनकी सरकार द्वारा पारित कानून ने अल्पसंख्यक वोट काटे हैं.

बड़े मुक़ाबले

कुल मिलाकर तमिलनाडु की 39 सीटें हर नज़रिए से महत्वपूर्ण हैं और विशेष रूप से जब तमिलनाडु की जनता अक्सर किसी एक द्रविड़ पार्टी या उसके सहयोगी को जिताती है- यानी 'आर या पार' की स्थिति यहां रहती है.

इस बार पेरियाकुलम चुनाव क्षेत्र से जयललिता की करीबी सहयोगी शशिकला के रिश्तेदार और वर्तमान सांसद टी.टी. वी दिनकरण मैदान में हैं.

कांग्रेस के टिकट पर शिवगंगा से पूर्व वाणिज्य मंत्री एम चिदम्बरम हैं और मयलादुतुरई से मणिशंकर अय्यर मैदान में हैं.

दक्षिण चेन्नई से डीएमके के दिग्गज टी.आर.बालू, मध्य चेन्नई से मुरासोली मारन के पुत्र दयानिधि मारन और उत्तरी चेन्नई से प्रभावशाली ट्रेड यूनियन नेता कुप्पुस्वामी चुनाव लड़ रहे हैं.

भाजपा के राज्य नेता सीपी राधाकृष्णन ने कोयम्बटूर से 1998 में जीतकर भाजपा का वहां खाता खोला था. इस बार वहाँ के परिणाम पर भी कई नजरें टिकी हैं.

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