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जयललिता सरकार की अलोकप्रियता से एनडीए को नुक़सान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तमिलनाडु में नेता, मुद्दा, सरकारों का कामकाज, पार्टियों की लोकप्रियता जैसी सामान्य चीज़ों की जगह गठबंधन का गणित ही सबसे प्रभावी कारक बन जाता है. यह चुनाव दो गठबंधनों, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, जिसमें अन्नाद्रमुक और भाजपा शामिल हैं, तथा डेमोक्रेटिक पीपुल्स एलायंस(डीपी), के बीच है जिसमें द्रमुक, कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टियाँ, पीएमके, एमडीएमके और मुस्लिम लीग शामिल हैं. राज्य का चुनावी हिसाब-किताब भी असल में इन दोनों गठबंधनों की पार्टियों की ताकत का हिसाब ही है. गठबंधन वाला राज्य तमिलनाडु की राजनीति के लिए गठबंधन नए नहीं है. 1967 में ही स्वर्गीय अन्नादुराई ने पहला महागठबंधन बनाया था, पर उसके बाद कांग्रेस कभी द्रमुक के साथ गठबंधन करती रही या अन्नाद्रमुक के साथ. केरल की तरह इस प्रदेश में अभी वोटों का गणित उतना नाज़ुक और संतुलित नहीं हुआ है कि दोनों खेमों को लगभग बराबर के पक्के वोटर मिल जाएं. गठबंधन की शुरुआती राजनीति में भी सिर्फ़ गठबंधन करके चुनाव नहीं जीता जा सकता था. 1996 चुनाव में द्रमुक-तमिल मनिल कांग्रेस गठबंधन के हाथों में हुई शर्मनाक पराजय का बदला लेने के लिए जयललिता ने 1998 चुनाव में महागठबंधन बनाया. उन्होंने न सिर्फ़ एमडीएमके, पीएमके और भाजपा जैसे छोटे लेकिन ठोस जनाधार वाले दलों को साथ लिया बल्कि राममूर्ति के नेतृत्व वाला राजीव कांग्रेस और सुब्रह्मण्यम स्वामी के नेतृत्व वाली जनता पार्टी को भी गठबंधन में रखा. परिणाम ये हुआ कि राज्य में शासन कर रहे द्रमुक-टीएमसी गठबंधन को भारी पराजय मिली, भले ही उसकी सरकार ज़्यादा अलोकप्रिय नहीं हुई हो. जयललिता के नेतृत्व वाले गठबंधन ने राज्य की 39 में से 30 सीटें जीतीं और यह परिणाम मात्र 5 फ़ीसदी बढ़त से हुआ. विजयी गठबंधन को 47 फीसदी वोट मिले थे जबकि द्रमुक वाले गठबंधन को 42 फीसदी. महागठबंधन उसके बाद से महागठबंधन बनाना चलन ही हो गया. अगली बार जब जयललिता ने केंद्र की सरकार गिरवा दी तो भाजपा, पीएमके और एमडीएमके को साथ लेकर द्रमुक ने नया गठबंधन बनाया.
1999 चुनाव में इस गठबंधन ने राज्य की 26 सीटें जीतीं जबकि इसकी पूर्व सहयोगी पार्टी, टीएमसी ने इसका साथ छोड़ दिया था. अन्नाद्रमुक ने कांग्रेस और दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों को साथ लेकर चुनाव लड़ा और 13 सीटें जीत गई. इस बार भी विजयी गठबंधन को मतों में 5 फ़ीसदी की बढ़त थी. 2001 के विधानसभा चुनाव में पूरी प्रक्रिया फिर से उलट गई. शासक द्रमुक गठबंधन के ज़्यादातर सहयोगी पाला बदलकर जयललिता के खेमे में चले गए. अबकी कांग्रेस और टीएमसी के साथ मुस्लिम लीग, कम्यूनिस्ट पार्टियाँ और कुछ निर्दलियों को साथ लेकर जयललिता ने चुनाव लड़ा और उनके गठबंधन को 50 फ़ीसदी वोट मिले. द्रमुक ने भी भाजपा और दो दलित पार्टियों को साथ लिया लेकिन यह गठबंधन 30 फ़ीसदी वोट ही पा सका. 12 फ़ीसदी की बढ़त पाकर अन्नाद्रमुक गठबंधन ने विधानसभा की 234 में से 195 सीटें जीत लीं और इसके साथ ही गठबंधन की राजनीति ने एक चक्र पूरा कर लिया. विधानसभा चुनाव में जयललिया के साथी रहे बाकी सभी दल अबकी बार द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन डीपीए में हैं और इसके चलते हाल के वर्षों का यह सबसे मजबूत गठबंधन बन गया है. अन्नाद्रमुक के पास सिर्फ़ भाजपा बची है और इस बार उसने किसी अन्य को जोड़ने का प्रयास भी नहीं किया है. सो डीपीए के शुरुआती बढ़त साफ दिखती है. पर इससे उसकी सीटों में क्या फ़र्क पड़ेगा, यह साफ नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसके सहयोगी छोटे दलों की ताकत का ठीक अंदाजा आसान नहीं है. सारा हिसाब पिछले चुनाव के आधार पर लगाना भी उचित नहीं होगा. दोनों गठबंधनों की अगुवा पार्टियों ने भी काफ़ी समय से स्वतंत्र रूप से चुनाव नहीं लड़ा है. इसलिए यह हिसाब लगाना भी आसान नहीं है कि उनका अपना वोटर समूह कितना-कितना बड़ा है. अगर पिछले वोटों का हिसाब लगाएँ तो डीपीए तो 55 फीसदी के करीब पहुँच जाएगा और अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन 34 फीसदी पर रूक जाएगा. इस प्रकार डीपीए की लीड 20 फीसदी से ज़्यादा होगी. दुर्भाग्य से अधिकांश राजनीतिक पंडित उसी गणित के आधार पर डीपीए की ताकत को ज़रूरत से ज़्यादा अंक रहे हैं. हर पार्टी अलग-अलग चुनाव के अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को साथ होकर दोहरा ही देगी यह संभव नहीं है. जयललिता को नुक़सान सीएसडीएस ने ऐसे में 1999 के चुनाव के बाद के अपने सर्वेक्षण में थोड़ा बेहतर फार्मूला निकाला था.
उस आधार पर डीपीए का वोट 52 फ़ीसदी होना चाहिए और दूसरे गठबंधन को 37 फ़ीसदी वोट हो सकता है. इस अनुमान को चुनावपूर्व के सर्वेक्षण भी पुष्ट करते लगते हैं. एनडीटीवी सर्वेक्षण के पहले दौर में डीपीए काफी बढ़त पर था. चेन्नई के लोमला कॉलेज के जन संचार विभाग द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में तो डीपीए को 62.1 फ़ीसदी और एनडीए को 31 फ़ीसदी वोट मिलता बताया गया है. पर इस सर्वेक्षण में महिलाओं की भागीदारी कम थी. अगर उनके रुझान और संख्या का हिसाब ध्यान रखें तो डीपीए को 57 फीसदी और एनडीए को 35 फीसदी वोट आता लगेगा. अन्य सर्वेक्षण भी लगभग यही हिसाब बता रहे हैं. जमीनी हालात भी यही संकेत दे रहे हैं. पिछले साल भर से जयललिता को सबसे खराब मुख्यमंत्री आंका जा रहा है. एनडीटीवी के सर्वेक्षण में भी यह बात सामने आई कि उनके अनेक प्रमुख फ़ैसलों को लोग पसंद नहीं करते. धर्मांतरण पर उनकी सरकार के फ़ैसले को 53 फ़ीसदी लोग पसंद नहीं करते. वाइको पर पोटा लगाने के फैसले को 61 फ़ीसदी वोटर पसंद नहीं करते. इसमें अन्नाद्रमुक को वोट करने की इच्छा रखने वाले 38 फ़ीसदी लोग भी शामिल हैं. कावेरी जल विवाद पर भी उन्हें 58 फ़ीसदी लोग असफल मानते हैं. मार्च में यह सर्वेक्षण हुआ था और अगर स्थितियों में नाटकीय बदलाव न आया होता तो साफ़ है कि इस बार उनकी पार्टी मिटने जा रही है. सीटों का बँटवारा अब सवाल सीटों का है. ऐसे में राज्य के चुनावी इतिहास पर नज़र डालना लाभकर हो सकता है. यहाँ चुनावी लहर ही चलती है, कभी इस पक्ष में तो कभी दूसरे पक्ष में. यह क्रम 1931 के चुनाव से दिख रहा है. और प्रदेश ही बदलता है, भले ही यहाँ क्षेत्रीय विविधता मौजूद है. द्रमुक उत्तर में मज़बूत है तो अन्नाद्रमुक दक्षिण में. पीएमके उत्तर के वन्नियार प्रभाव वाले क्षेत्रों में मज़बूत है पर इनके बावजूद राज्य के मतदाताओं के मूड में बदलाव का स्तर समान रहता है, स्विंग समान आता है. ऐसे में निश्चित रूप में एनडीए के लिए तस्वीर लुभावनी नहीं लगती. अगर डीपीए को सचमुच 15 फ़ीसदी की लीड मिली तो राज्य में वह किसी दूसरे को खड़ा नहीं रहने देगा. अगर जयललिता सरकार की अलोकप्रियता और दिखी तो यह अंतर बढ़ भी सकता है. अगर अन्नाद्रमुक को अपनी पिछली 13 सीटें बचानी हैं तो उसे द्रमुक खेमे का पाँच फ़ीसदी वोट अपनी ओर लाना होगा. यह बहुत ही भारी काम दिखता है. |
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