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भ्रष्टाचार से लड़ने वालों को 'क़ानूनी' संरक्षण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में भ्रष्टाचार से लड़ रहे लोगों यानी 'व्हिसल ब्लोवर्स' के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण पहल की गई है. भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल किरीट रावल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले लोगों के संरक्षण के लिए भारत सरकार के कर्मिक विभाग ने एक प्रस्ताव पारित किया है और सदन में कोई मसौदा पेश होने तक यह प्रस्ताव प्रभावी रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने सत्येंद्र कुमार दुबे की हत्या के मामले में दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सॉलिसिटर जनरल को आदेश दिया था कि एक क़ानून बनाकर भ्रष्टाचार से लड़ने वालों को संरक्षण दिया जाए. कर्मिक विभाग ने इस प्रस्ताव में मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) को यह अधिकार दिया है कि वे किसी भी व्यक्ति की शिकायत पर केंद्र सरकार के कामकाज से संबंधित भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई करेंगे. प्रस्ताव के मुताबिक किसी भी अनियमितता की शिकायत मिलने पर सतर्कता विभाग उसकी जाँच करेगा और उस पर आवश्यक कार्रवाई करने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश देगा. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद सॉलिसिटर जनरल ने इस क़ानून का प्रारूप तैयार किया जिसमें ज़रूरी सुधार करने के बाद इसे केंद्र को लागू करने के लिए दे दिया गया है. सकारात्मक पहल प्रस्ताव की ख़ास बात यह है कि सतर्कता विभाग भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले व्यक्ति का नाम उजागर करने वालों के खिलाफ़ भी कार्रवाई करेगा. ग़ौरतलब है कि पिछले वर्ष सत्येंद्र दुबे ने अपने विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय से की थी जिसके बाद उनका नाम सामने आ गया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई. जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने इस मुद्दे पर कहा "यह क़ानून देश के सत्येंद्र जैसे लोगों को, जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, संरक्षण तो देगा ही. साथ ही इससे ईमानदार लोगों का हौसला भी बढ़ेगा." लेकिन उन्होंने इस क़ानून का एक कमज़ोरी भी बताई. उन्होंने कहा, "इस क़ानून की एक कमज़ोरी यह है कि सतर्कता आयोग की शिकायतों के बारे में केंद्र को दी गई रिपोर्ट को मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं है." इसके बावजूद देश में इस तरह के क़ानून के लागू होने को एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है. भारत के अलावा अन्य चार देशों ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में यह क़ानून पहले से ही लागू है. |
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