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श्रीलंका में कुमारतुंगा सरकार को झटका | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका में राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा की अल्पमत में रह गई सरकार को नई संसद चुने जाने के बाद पहला झटका लगा है. संसद के स्पीकर पद के लिए हुए चुनाव में मुख्य विपक्षी दल को जीत हासिल हुई है. और यह जीत सिर्फ़ एक वोट से हुई जिसके बाद विपक्षी उम्मीदवार डब्ल्यु जे एम लोकबंडारा का स्पीकर बनने का रास्ता साफ़ हो गया. सत्ताधारी गठबंधन ड्यू गुणशेखरा को नया स्पीकर बनाना चाहता थे मगर विपक्षी दल के उम्मीदवार पूर्व न्याय मंत्री डब्ल्यु जे एम लोकबंडारा थे. डब्ल्यु जे एम लोकबंडारा का चुनाव साफ़ होते ही उन्हें स्पीकर की कुर्सी तक पहुँचाया गया और संसद के 13वें स्पीकर की शपथ दिलाई गई. इससे पहले संसद के कामकाज के पहले ही दिन स्पीकर के चुनाव को लेकर संकट खड़ा हो गया था क्योंकि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही उम्मीदवारों को बराबर वोट मिले थे. फिर संसद में नौ बौद्ध भिक्षुओं के मत महत्वपूर्ण बन गए मगर उनसे भी बात नहीं बनी. सात भिक्षुओं ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, एक भिक्षु आए ही नहीं और एक का मत रद्द हो गया. लेकिन दोनों ही उम्मीदवारों को 108 वोट मिले थे. मुश्किल स्पीकर के चुनाव को लेकर श्रीलंका मे ये संकट ऐसे समय आया जब राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा, सत्ताधारी गठबंधन में शामिल पार्टी पीपुल्स लिबरेशन फ़्रंट(जेवीपी) के साथ सत्ता में भागीदारी को लेकर जारी मतभेद को निपटाने की कोशिश में जुटी हैं. कुमारतुंगा के गठबंधन को दो अप्रैल को हुए चुनाव में संसद की 225 सीटों में से 105 सीटें मिली थीं. जेवीपी को 39 सीटें मिलीं और वह सत्ता में उतनी भागीदारी से खुश नहीं है जितनी की कुमारतुंगा ने उन्हें दी है. राष्ट्रपति के गठबंधन के पास बहुमत के लिए ज़रूरी सीटों से आठ सीटें कम थीं और सरकार बनाने के लिए उन्हें छोटे गुटों का समर्थन चाहिए था. बीबीसी की कोलंबो संवाददाता का कहना है कि इसका मतलब ये होगा कि संसद में काम-काज की रूपरेखा तय करने के मामले में कुमारतुंगा के विरोधियों का पलड़ा भारी रहेगा. ऐसे में विपक्षी गठबंधन क़ानून में बदलाव करने के राष्ट्रपति के प्रयासों में बाधा डाल सकते हैं. |
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