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सर्वेक्षणों से असंतुष्ट हैं वरिष्ठ पत्रकार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के वरिष्ठ पत्रकारों ने चुनावी जनमत सर्वेक्षणों की गुणवत्ता पर संदेह जताया है. बीबीसी हिंदी सेवा के फ़ोन-इन कार्यक्रम 'आपकी बात बीबीसी के साथ' में अपने विचार व्यक्त करते हुए साप्ताहिक पत्रिका 'आउटलुक' के प्रधान संपादक विनोद मेहता ने भारत के सेफोलोजिस्ट या चुनावी सर्वे के विश्लेषकों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा, "तरह-तरह के लोग जनमत सर्वे करा रहे हैं. इससे ये समस्या खड़ी हो गई है कि कई ऐसे लोग भी इस जटिल कार्य से जुड़ गए हैं जिन्हें इसकी बुनियादी जानकारी तक नहीं है." मेहता ने कहा, "जनमत सर्वे की वैज्ञानिक प्रक्रिया की जानकारी या फ़ील्ड-वर्क के बिना ही अनेक लोगों के इस क्षेत्र में आ जाने के कारण कई बकवास सर्वेक्षण सामने आ रहे हैं और इसके चलते गंभीर और निष्पक्ष जनमत सर्वेक्षण करने वालों की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ रहा है." 'इंडियन एक्सप्रेस' के संपादक शेखर गुप्ता ने जनमत सर्वेक्षणों को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बताया लेकिन कहा कि इन पर निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए. उन्होंने कहा, "एक लोकतंत्र में जनमत सर्वेक्षणों पर रोक नहीं लगाई जा सकती लेकिन उन पर नज़र रखी जानी चाहिए, उनकी निगरानी की कोई व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि जिनके पास सर्वे करने की योग्यता और क्षमता है वे ही इस फ़ील्ड में रह जाएँ." चुनाव पूर्व के सर्वेक्षणों के अक्सर ग़लत साबित होने के बारे में गुप्ता ने कहा भारत जैसे विविध देश में इससे बचा नहीं जा सकता, लेकिन उन्होंने कहा कि पिछले विधान सभा चुनावों में अंतिम तीन-चार दिन में मतदाताओं के रुझान में भारी परिवर्तन के कारण चार में ले तीन राज्यों में सर्वे ग़लत साबित हुए. 'एशियन एज' के संपादक एमजे अकबर का ग़ुस्सा सर्वे कराने वाली एजेंसियों से ज़्यादा पत्रकारों पर दिखा. उन्होंने कहा, "कोई टीवी चैनल या अख़बार जब किसी एजेंसी को सर्वे का जिम्मा सौंपता है तो सारा कुछ उस एजेंसी पर छोड़ दिया जाना चाहिए." अकबर ने आरोप लगाया कि कुछ पत्रकार और संपादक सर्वे में जुटाए गए आँकड़ों का अपनी इच्छा के अनुरूप विश्लेषण करते हैं.
'जनसत्ता' के संपादकीय सलाहकार प्रभाष जोशी की राय में भारत में जनमत सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता बहुत ही कम रह गई है. उन्होंने भारत में जनमत सर्वेक्षणों की वैज्ञानिक पद्धति पर ही सवाल उठाया, "जनमत सर्वे की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए सर्वे कराने वाली एजेंसियों को कोई बेहतर तरीका निकालना होगा. कुछ सौ या हज़ार लोगों की राय को 65 करोड़ मतदाताओं की राय कैसे माना जा सकता है." पत्रकार नीरजा चौधरी मानती हैं कि जनमत सर्वेक्षण अपनी पुख़्ता राय नहीं रखने वाले मतदाताओं को प्रभावित करते हैं, लेकिन उन्होंने कहा कि इन सर्वेक्षणों पर रोक लगाया जाना कोई समाधान नहीं है. कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए सेफोलोजिस्ट जीवीएल नरसिंह राव ने इस बात से असहमति जताई कि सर्वेक्षणों के नतीजे मतदाताओं की राय बदल देते हैं. |
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