|
अफ़ग़ानिस्तान पर बर्लिन में सम्मेलन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अफ़ग़ानिस्तान को सहायता के मुद्दे पर विचार के लिए 60 से ज़्यादा देशों के अधिकारी बर्लिन में जमा हुए हैं. माना जाता है कि दाता देशों के इस दोदिवसीय सम्मेलन में अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई अगले सात वर्षों की अवधि के लिए 27 अरब डॉलर से ज़्यादा की माँग करेंगे. लेकिन विश्लेषकों के अनुसार करज़ई को इतनी सहायता राशि मिलने की संभावना नहीं है. ख़ुद अफ़ग़ान अधिकारी मानते हैं कि उन्हें आधी रकम भी मिल जाए तो यह सौभाग्य ही माना जाएगा. सम्मेलन में दाता देश अफ़ग़ान सरकार और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट पर विचार करेंगे. काबुल से बीबीसी संवाददाता के अनुसार अफ़ग़ान सरकार का मुख्य तर्क ये होगा कि देश की सुरक्षा स्थिति पर किए जा रहे ख़र्च से तुलना की जाए तो पुनर्निर्माण की मद में सात वर्षों की अवधि के लिए 28 अरब डॉलर ज़्यादा नहीं है. उल्लेखनीय है अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा मामलों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को हर साल कोई 13 अरब डॉलर ख़र्च करना पड़ रहा है. अस्थिरता की आशंका बर्लिन सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब अफ़ग़ानिस्तान के एक बार फिर अस्थिरता का शिकार बनने की आशंका व्यक्त की जा रही है. संयुक्त राष्ट्र ने भी चेतावनी दी है कि पर्याप्त आर्थिक सहायता के बिना अफ़ग़ानिस्तान स्थायित्व बनाए रखने में नाकाम हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया निर्धनतम देशों में से एक अफ़ग़ानिस्तान को भारी मात्रा में सहायता राशि नहीं मिली तो उसे मादक पदार्थों के अवैध व्यापार के चंगुल में फँसने की आशंका है. वर्ष 2001 में तालेबान शासन के पतन के बाद से अफ़ग़ानिस्तान में विकास कार्यों को गति नहीं दी जा सकी है. असुरक्षा के माहौल के कारण देश का अधिकांश दक्षिण-पूर्वी इलाक़ा अंतरराष्ट्रीय समुदाय की पहुँच से बाहर है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||