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बिहार के बारे में बदली राय | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के कारवाँ में शामिल होने के लिए ही मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार बिहार आने के लिए दिल्ली से रवाना हुआ. पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी ज़िले के बागडोगरा हवाई अड्डे से किशनगंज होते हुए पूर्णिया के चार घंटे के सफर में उबड़-खाबड़ सड़क के दोनों तरफ, बीच-बीच में कहीं खेतों मे काम करते किसानों, और कहीं खाली मैदानों को देखकर, यही सोच रहा था कि सचमुच यही वो इलाका है, जहाँ हमारे सर्वाधिक श्रोता हैं ! इस राज्य के पिछड़ेपन, निरक्षरता और मूलभूत सुविधाओं के अभाव की जैसी तस्वीर मेरे मन में थी, पूर्णिया पहुँचकर लगा कि वास्तविकता भी वैसी ही है. वहाँ पहुँचने तक शाम हो गई थी और शहर में बिजली न होने की वजह से कुछ पता नहीं चल पा रहा था, नई जगह, अनजान लोग और घुप अंधेरा. अगले दिन के बीबीसी कार्यक्रम के बैनरों पर मेरी नज़र ज़रुर टिकी. अगले दिन जैसे ही ब्रजेश उपाध्याय और स्टुडियो संचालक मैट क्लेगहॉर्न के साथ मैं पूर्णिया के सभास्थल पर पहुँचा, श्रोताओं की भीड़ देखकर, एक पल के लिए चौंक गया. ब्रजेश और मैट इस कारवाँ में पहले से शामिल थे इसलिए शायद उन्हें इतनी हैरानी नहीं हुई. मगर ये तो केवल शुरुआत थी, वहाँ उपस्थित श्रोताओं को पहले से ही उनके शहर आई बीबीसी की टीम के सदस्यों के नाम मालूम थे. असंतोष हमारे पहुँचते ही श्रोताओं ने खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया. एक घंटे से अधिक चले कार्यक्रम के बाद जब हम सभास्थल से रवाना हो रहे थे तो कुछ श्रोता असंतुष्ट नजर आए. उनमें से कुछ ने सुरक्षाकर्मियों के रोकने के बावजूद हमारी गाड़ी तक पहुँचकर हमसे शिकायत की कि श्रोताओं से हमारा संवाद अधूरा है क्योंकि वे हमसे न तो बात कर पाए और न ही सबको अपनी बात कहने का मौका मिला.
पूर्णिया के बाद कटिहार, खगड़िया, बेगूसराय, लखीसराय और भागलपुर तक कारवाँ के साथ मेरे सफ़र ने मुझे जैसे मानो लंदन की ठंड में आने वाली चैन की नींद से अचानक उठाकर अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास एक बार फिर करवाया है. कई बार मैंने अपनेआप को श्रोताओं के बीच उस परीक्षार्थी की तरह पाया, जो साक्षात्कार दे रहा है और अपनी तरफ से चतुराई भरे जवाब देने के बावजूद बच नहीं पा रहा है. श्रोताओं के सवाल इराक युद्ध से शुरु होकर हटन आयोग को छूते हुए, सीधे हमारे प्रसारणों तक पहुँच जाते हैं. कुछ जानना चाहते हैं कि रविवार के 'आपकी बात' कार्यक्रम में उन्हें दूसरा सवाल पूछने का मौका क्यों नहीं दिया जाता, तो किसी का सवाल है कि क्या देश के नागरिकों को अपने प्रधानमंत्री से सवाल पूछने का मौका नहीं मिलना चाहिए. इन सवालों का जवाब दे ही रहा था तो कुछ अन्य जानना चाहते थे कि अचला जी की आवाज़ नियमित रूप से हमारे प्रसारणों में क्यों नहीं सुवाई देती. पूरे देश की तरह बिहार में भी गर्मी -- मौसम और चुनावों-- दोनों की बढ़ रही है, लेकिन यहाँ श्रोताओं का बीबीसी के कारवाँ से ध्यान हटाने के लिए ये सब पर्याप्त नहीं है. विश्वसनीयता हर शहर में जहाँ भी बीबीसी का कारवाँ पहुँच रहा है, वहाँ उमड़ रही श्रोताओं की भीड़ साबित कर रही है कि भारत में मीडिया के तेज़ी से बदलते स्वरुप यानी 24 घंटे के टेलीविज़न समाचार चैनलों की भरमार के बावजूद अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय समाचारों और उनके विश्लेषण के लिए बीबीसी की विश्वसनीयता बरकरार हैं.
अगर इन बदलावों का कुछ असर है तो वो है बीबीसी की श्रोताओं के प्रति बढ़ती ज़िम्मेदारी. इस दौरान यह भी पता चला कि जिस-जिस शहर में हमारा कारवाँ पहुँच रहा है, केवल उसी शहर के श्रोता वहाँ के विचार-मंच में शामिल हो रहे हैं, ऐसा नहीं है. कई लोग घंटों सफर कर सभास्थल पर पहुँच रहे हैं. खगड़िया के हमारे कार्यक्रम में मेरी भेंट बिहार में बाढ़ की स्थिति पर 20 वर्षों से काम कर रहे डॉक्टर दिनेश मिश्रा से हुई जो पटना से चार घंटे का सफर कर आए थे. बीस-तीस किलोमीटर दूर से हमारे कार्यक्रमों मे आने वाले श्रोताओं की संख्या काफी अधिक है. इस राज्य के विभिन्न ज़िलों का दौरा कर अब जब मैं लौट रहा हूँ तो यहाँ के बारे में मेरा नज़रिया बिल्कुल बदल गया है! |
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