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शनिवार, 21 फ़रवरी, 2004 को 01:40 GMT तक के समाचार
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दौरा, देरी और दीवाने

बीबीसी हिंदी कारवाँ
लंदन से दिल्ली तक आठ घंटे की हवाई उड़ान. उसके बाद वहाँ से बनारस तक फिर उड़ना था.

फिर कुछ ही घंटों में हम पहुँच जाते आज़मगढ़ जहाँ से हमें बीबीसी हिंदी के कारवाँ में शामिल होना था.

लेकिन संयोग कहिए या दुर्योग ऐसा हो न सका. दिल्ली में कुछ ही मिनटों के हेरफेर से हमारा जहाज़ छूट गया.

हमने दिल्ली हवाई अड्डे पर रूपा झा को दौड़कर हवाई जहाज़ पकड़ते देखा लेकिन हमारे लिए उसके दरवाज़े बंद हो चुके थे.

अब हवाई अड्डे पर मैं और लंदन से मेरे साथ आईं स्टूडियो मैनेजर लीसा हैक सोच रहे थे कि अब आज़मगढ़ कैसे पहुँचें.

मौक़ा निकला

मुझे तो साथ में ये तकलीफ़ भी थी कि इतने दिनों बाद वाराणसी जाने का मौक़ा मेरे हाथ से निकल गया फिसल सा गया.

वरुणा और अस्सी के बीच बसा वाराणसी दुनिया के सबसे पुराने ज़िंदा शहरों में से एक है.

बाबा विश्वनाथ की नगरी है. अवधूत किनाराम का शहर है, रामचरित मानस की रचना स्थली है और कबीर की ज़िंदगी का गवाह है.

महामना मदन मोहन मालवीय के हस्ताक्षर यानी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय अब भी यहाँ मौजूद है तो शहनाई के शहंशाह उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान की संगीत लहरी भी सुनी जा सकती है.

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रूपा झा ने भी संभाली कमान

और जो काशी की बात करे वह काशी के मुसलमान नज़ीर बनारसी को कैसे भूल सकता है.

लेकिन सांप्रदायिक तनाव, कई बार हुए दंगों की यादें, लगातार बढ़ती गुंडागर्दी और शहर की सड़कों-गलियों की बदहाली ने शहर पर दाग़ लगा दिए हैं.

लेकिन इन सबसे बड़ा दाग़ इस शहर के माथे पर लग रहा है वो है गंगा की गंदगी.

मैं चाहता था कि वहाँ जाकर मैं एक बार फिर प्रोफेसर वीरभद्र मिश्र से मिलूँ. कुछ बात करूँ स्वच्छ गंगा अभियान के बारे में.

प्रोफेसर वीरभद्र मिश्र बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हाईड्रोलिक इंजीनियरिंग के प्रोफेसर रहे हैं और साथ में इस शहर के प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिर के महंथ भी हैं.

गंगा की सफाई को उन्होंने अपना ध्येय बना रखा है और उसके लिए अभियान चला रहे हैं.

उनसे मिलने की मेरी इच्छा तो रह गई लेकिन मेरी सहयोगी रूपा झा बनारस पहुँच गई थी और उनसे मिल भी आईं.

ख़ैर किसी तरह इतना तो हुआ कि हम शाम की उड़ान से लखनऊ पहुँच गए.

सुबह-ए-बनारस नहीं तो शाम-ए-अवध ही सही. लेकिन फिर वहाँ से आज़मगढ़ की दूरी थी 300 किलोमीटर.

और साथ में ये डर कि कार्यक्रम शुरू होने तक नहीं पहुँच पाएँ तो क्या होगा.

वो यात्रा...

इसलिए पूरी रात टैक्सी में गुजरी. बीच-बीच में धक्के हिचकोले खाते हुए. बीच में कहीं-कहीं रुककर चाय पीते हुए.

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बीबीसी हिंदी के दीवानों की भारी भीड़ जुटी

जो इंग्लैंड से आईं हमारी साथी लीसा के लिए अनूठा अनुभव था.

हमारी थकान और ये परेशानी उतनी ही देर तक रही जब तक आज़मगढ़ में कारवाँ के पास नहीं पहुँच गए.

बात शुरू होने से पहले ही लोग किनारे आकर हाथ पकड़ते. सबसे ज़्यादा लोग ओंकार भाई को याद कर रहे थे.

और नाराज़गी जता रहे थे इस बात पर कि अचला जी और ममता जी उनके शहर क्यों नहीं आईं.

लेकिन एक बार कार्यक्रम शुरू हुआ तो फिर क्या कहने. सारी थकान दूर हो गई.

और शुरू हुआ ये एहसास कि कितने दूर होकर भी कितने पास हैं. लंदन से चलने वाली बीबीसी हिंदी और भारत में बसे उसके सुनने वाले.

ऐसा हंगामा था कि मत पूछो क्या हुआ. किसने क्या कहा. बस याद है तो सिर्फ़ यह कि बहुत भीड़ थी.

सब बीबीसी के चाहने वाले थे दीवाने थे.

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