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एनडीए ने चुनाव फ़ैसला प्रधानमंत्री पर छोड़ा
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एनडीए ने इस साल होने वाले आम चुनाव की तारीख़ों के बारे में फ़ैसला करने का अधिकार प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को दे दिया है. चुनावों की तारीखों के बारे में विचार करने के लिए एनडीए की आज दिल्ली में बैठक हुई जिसमें सहयोगी दलों ने यह फ़ैसला किया. मौजूदा लोक सभा का कार्यकाल इस साल अक्तूबर में समाप्त हो रहा है. ग़ौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी पहले ही संकेत दे चुकी है कि वह चुनाव जल्दी कराने के पक्ष में है. इसी पर विचार करने के लिए भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की आगामी 11 और 12 जनवरी को हैदराबाद में एक अहम बैठक होने वाली है. उस बैठक से पहले एनडीए की आज की बैठक को महज़ एक औपचारिकता माना जा रहा था. चुनाव समय से पहले कराने के लिए सहयोगी दलों की सहमति हासिल करने के प्रयासों के तहत लाल कृष्ण आडवाणी शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से पहले ही मुलाक़ात कर चुके हैं. एनडीए के संयोजक जॉर्ज फ़र्नान्डीस अगाली दल और तेलगु देशम पार्टी से बातचीत कर रहे हैं. आँध्र प्रदेश में भी विधान सभा भंग होने के बाद अप्रेल तक चुनाव हो जाने चाहिए. जल्दी चुनाव भाजपा को पिछले महीने तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में बेहतरीन सफलता मिली थी और पार्टी चाहती है कि उसका पूरा फ़ायदा ले लिया जाए. साथ ही देश की अर्थव्यवस्था भी इस समय पटरी पर है और पार्टी इसे भी भुनाना चाहती है. इनके अलावा अभी ही ख़त्म हुए सार्क शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान के साथ रिश्तों में सुधार की जो शुरुआत हुई है पार्टी उससे भी उत्साहित है. यूँ तो आम चुनाव सितंबर में होने हैं मगर माना जा रहा है कि अब ये चुनाव अप्रैल या मई में करा लिए जाएँगे. पार्टी नेता जेपी माथुर इस बारे में कहते हैं, "ये दो महीने का समय ही सबसे अच्छा है क्योंकि उसके बाद बेहद गर्मी हो जाएगी और फिर बारिश शुरू हो जाएगी."
इस बैठक में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी गठबंधन के घटक दलों के नेताओं से मिलेंगे. समाचार एजेंसियों के अनुसार पाकिस्तान यात्रा से लौटे प्रधानमंत्री वाजपेयी इन नेताओं को भारत-पाकिस्तान बातचीत के बारे में अवगत करवाएँगे. इसके साथ ही समय से पहले लोकसभा चुनाव करवाए जाने के मुद्दे पर भी चर्चा होने की संभावना है. वैसे पार्टी पहले ही कई घटक दलों से इस विषय में अनौपचारिक बातचीत कर चुकी है. माना जा रहा है कि यदि समय से पहले चुनाव करवाए जाने का फ़ैसला होता है तो सरकार को बजट न लाकर संसद से 'वोट ऑन अकाउंट' पारित करवाना पड़ सकता है और इसके लिए इन दलों को विश्वास में लेना ज़रूरी होगा. |
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