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वाजपेयी-मुशर्रफ़ कॉफ़ी का ज़ायका
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुए सार्क सम्मेलन के दौरान दुनिया की नज़र इस पर ज़्यादा थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच ऊँट किस करवट बैठता है. सम्मेलन के अंतिम दिन पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि दोनों देश अपने मतभेद भुलाने के लिए फिर से बातचीत की मेज़ पर बैठने के लिए तैयार हो गए हैं. भारत और पाकिस्तान के बीच के संबंध अब कुछ इस तरह से अजीब हो गए हैं कि ये दोनों दो क़दम आगे बढ़ते हैं तो दो तीन क़दम पीछे हट जाते हैं. शायद इनके इसी रवैये पर अब चुटकियाँ भी ली जाने लगी हैं या यूँ कहें कि दोस्ती की उम्मीदें काफ़ी बढ़ने लगी हैं. वाजपेयी और मुशर्रफ़ की मुलाक़ात पर इस्लामाबाद के एक कॉफ़ी बेचने वाले को कुछ नया ही तरीक़ा सूझा. यह दुकानदार इतना उत्साहित नज़र आया कि उसने अपनी दुकाने के सामने मोमबत्तियों के ज़रिए उर्दू में बड़ा-बड़ा करके दोस्ती शब्द लिख डाला. उसकी कॉफ़ी दुकान का नाम है सिविल जंक्शन और यहाँ कुछ अनोखी क़िस्म की कॉफ़ियाँ मिलती हैं. उसने वाजपेयी कॉफ़ी और मुशर्रफ़ कॉफ़ी के नाम से अपनी दुकानदारी चलाई और इन कॉफ़ियों को उनके ब्रांड के मुताबिक़ नाम भी दिए. मुशर्रफ़ के नाम की कॉफ़ी का नाम है - मुशर्रफ़ गैसप्रेसो और इसके बारे में लिखा है कि यह ज़्यादा पुरानी कॉफ़ी नहीं है क्योंकि मुशर्रफ़ की उम्र इतनी ज़्यादा नहीं है. कॉफ़ी को हल्की लेकिन टिकाऊ ज़ायक़ा देने वाली बताया गया है और रंग कहा गया है ख़ाकी जैसी कि मुशर्रफ़ की वर्दी होती है. "इस कॉफ़ी का स्वाद लंबी किक देता है और काफ़ी देर तक रहता है." ख़ासियत वाजपेयी कॉफ़ी की क़ीमत साठ रूपए है और इसे काफ़ी पुरानी बताया गया है लेकिन काव्यात्मक भी. इस कॉफ़ी की ख़ासियत ये है कि जितनी इससे उम्मीद की जाती है यह उससे ज़्यादा संतुष्टि देती है.
दुकान के कॉफ़ी मास्टर अमजद बताते हैं कि उन्होंने दोनों मुल्कों की दोस्ती का ज़ायक़ा देने के लिए यह तरीक़ा सोचा. "यह सिलसिला आगरा शिखर सम्मेलन से शुरू हुआ. उस वक़्त मुशर्रफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाकर वहाँ गए थे और अब वाजपेयी साहब दोस्ती की ख़्वाहिश के साथ ही पाकिस्तान आए." अमजद तो कहते हैं कि उन्होंने यह भी उम्मीद लगाई थी कि दोनों नेता उनकी दुकान पर आते और दोस्ती के नाम पर शुरू की गईं इन कॉफ़ियों का ज़ायक़ा लेते. दुकान पर कॉफ़ी पीने आई एक छात्रा नताशा कहती हैं कि उन्होंने उस वक़्त तो साधारण कॉफ़ी ही पी लेकिन यह भी कहा कि अगर ये दोनों नेता अपनी बातचीत शुरू करते हैं तो वे इनके नामों की कॉफ़ियाँ ज़रूर पिएंगी. हालाँकि वह बहुत उत्साहित नज़र नहीं आईं लेकिन यह ज़रूर कहा कि अगर कुछ हो जाए तो वाक़ई बहुत ही अच्छा होगा. एक अन्य छात्र अम्मार भी यही कहते हैं कि फिलहाल तो वे सामान्य कॉफ़ी पी रहे हैं लेकिन अगर वाजपेयी-मुशर्रफ़ बातचीत आगे बढ़ती है और कोई ठोस नतीजा निकलता है तो वे इन दोनों कॉफ़ियों का ज़ायक़ा लेने के बारे में सोच सकते हैं. "मुशर्रफ़ कॉफ़ी बहुत दृढ़ है और वाजपेयी कॉफ़ी बहुत भारी है इसलिए फिलहाल तो केपीचीनो ही पीना बेहतर है." |
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