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शुक्रवार, 19 दिसंबर, 2003 को 13:34 GMT तक के समाचार
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'संयुक्त राष्ट्र दरकिनार नहीं'
राष्ट्रपति मुशर्रफ़
राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है

पाकिस्तान के सूचना मंत्री शेख रशीद ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के बयान पर स्पष्टीकरण दिया है.

शेख रशीद ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने कहा था कि बुनियादी तौर पर तो हमारा संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव है. लेकिन भारत कोई संजीदा बात करे और इस मसले को हल करना चाहे तो हमारे जहन में और भी खाके हैं.

पाकिस्तान के सूचना मंत्री का कहना था कि हम उसमें लचक दिखा सकते हैं क्योंकि 50 साल हो गए, ऐसी कुछ बातें हैं जिन पर अमल करने में दिक्कतें हों, तो हम कश्मीरियों से बात कर उन्हें बेहतर तौर पर पेश कर सकते हैं. ये इस फलसफे की बुनियाद है.

शेख रशीद का कहना था कि अमरीका और पश्चिमी देशों ने इसका स्वागत कर दिया लेकिन देखना है कि भारतीय प्रधानमंत्री इसको कैसे देखते हैं.

वो चार जनवरी को सार्क की बैठक में यहाँ आ भी रहे हैं.

उनका कहना था कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने 'बोल्ड' बयान दे दिया है. और कश्मीर का मसला हल करने में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए.

 राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने कहा था कि वो संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार नहीं बल्कि लचक दिखाने को तैयार है.

पाकिस्तान के सूचना मंत्री

शेख रशीद का कहना था," राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने कहा था कि वो संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार नहीं बल्कि लचक दिखाने को तैयार है."

पाकिस्तान के सूचना मंत्री का कहना था कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने कहा था कि हम संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के पक्ष में हैं. अगर भारत कहे कि इस पर संजीदगी से बात करनी है तो हम लचक दिखाने को तैयार हैं.

उनका कहना था कि कश्मीर के मसले पर हम भारत के साथ खुले दिल, दिमाग और सोच के साथ बात करना चाहते हैं.

शेख रशीद का कहना था कि ये असल मुद्दा है और हम इसे हल करना चाहते हैं. सौभाग्य से राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के रूप में हमारे पास नेतृत्व मौजूद है जो इस मसले को हल करने की स्थिति में है. और भारत को ये मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहिए.

उन्होंने एक बार फिर स्पष्ट किया कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के पक्ष में है और अगर भारत समझता है कि इस मसले को हल करना है तो हम खुले दिल से बात करते हैं कि ये कैसे हल हो सकता है.

शेख रशीद का कहना था कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने इस मसले पर वाकई एक लचक दिखाई है. अब देखना है कि भारत इस पेशकश को कैसे लेता है. या फिर पुरानी रागिनी अलापते रहते हैं कि ये अटूट अंग है तो फिर बड़े सारे मसले हैं.

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