|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ का अंबार
भारत में कंप्यूटर, मोबाइल फ़ोन और अन्य कंप्यूटर उपकरणों का कबाड़ पर्यावरण के लिए बड़ी समस्या बनता जा रहा है. अमरीका में हर साल तीन करोड़ कंप्यूटर फेंके जाते हैं और उनमें से बड़ी संख्या भारत और चीन में पहुँच जाती है. एक अनुमान के अनुसार भारी धातुओं के कबाड़ में बिजली उपकरणों का 70 प्रतिशत योगदान होता है. भारत ख़ासकर दिल्ली में कंप्यूटर कबाड़ को लेकर अब चिंता व्यक्त की जा रही है. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के वन प्लेनेट कार्यक्रम में टॉकिस इंडिया अभियान चलाने वाले रवि अग्रवाल ने ये बात उठाई. उनका कहना था कि इस कचरे में पारा, सीसा, तांबे के तार और अन्य ज्वलनशील पदार्थ होते हैं. उनका कहना था कि जब इन कंप्यूटरों को दोबारा तैयार किया जाता है तो इन धातुओं और रसायनों को छोड़ दिया जाता है और ये पर्यावरण के लिए बड़ा ख़तरा बन जाते हैं. समस्याएँ इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ को लेकर भारत, चीन और बांग्लादेश में समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं. होता ये है कि कंप्यूटर के दोबारा प्रयोग में पुराने कंप्यूटर के बहुत से पुराने पुर्जों को निकाल बाहर किया जाता है.
इनमें से अनेक को या तो जला दिया जाता है या फिर फेंक दिया जाता है. इस प्रक्रिया में सभी तरह के रसायन इस्तेमाल किए जाते हैं. जब पीवीसी वाले तांबे के तारों को जलाया जाता है तो इससे निकलने वाले रसायन जहरीले होते हैं. साथ ही इस बात को भी लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है कि इस काम में लगे लोगों के लिए भी ये गंभीर ख़तरा उत्पन्न करता है. रवि अग्रवाल का कहना था कि इसमें लगे लोगों के लिए ये जीवनयापन और जहर के बीच चुनने जैसा फ़ैसला होता है. उनका कहना था कि एक सर्वेक्षण से पता चला है कि इसमें काम करने वाले लोगों को सांस की बीमारियाँ अधिक पायी जाती है. रवि अग्रवाल का कहना था कि कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियों को पुराने कंप्यूटर ख़रीदने वाली कंपनियों को ये निर्देश देने चाहिए कि वो पर्यावरण का ध्यान रखें. यूरोप में 2006 से ऐसे नियम लागू हो जाएँगे जिनके अनुसार कंप्यूटर निर्माताओं को ऐसे नुक़सानदेह उपकरणों को हटाना पड़ेंगी. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||