|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
असम में 17 हज़ार हिंदीभाषी शरणार्थी बने
भारत के पूर्वोतर राज्य असम में लगातार हो रहे जानलेवा हमलों के बाद 17 हज़ार से अधिक हिंदीभाषी लोगों को शरणार्थी शिविरों में पहुँचा दिया गया है. अधिकारियों का कहना है कि हमलों के डर से राज्य के अंदरूनी इलाक़ों और गाँवों से लोगों का इन अस्थाई तौर पर गठित शिविरों में आना जारी है. राज्य के गृह सचिव बीएन मजूमदार ने बीबीसी को बताया कि सरकार ने राहत के पूरे इंतज़ाम किए हुए हैं. उनका कहना था कि इन लोगों को तभी वापस भेजा जाएगा जब इन संवेदनशील इलाक़ों से सुरक्षाबल अलगाववादियों को खदेड़ देंगे. राज्य में हिंदीभाषियों के ख़िलाफ़ हिंसा में पिछले एक सप्ताह में 56 लोगों की जानें गई हैं. इधर हिंदीभाषियों के एक संगठन पूर्वोत्तर हिंदी भाषी सम्मेलन ने एक बयान में कहा है कि हमलों के बाद से कम से कम 10 हज़ार हिंदीभाषी लोग असम छोड़ कर चले गए हैं. हिंदीभाषियों पर हमले की घटनाएँ रुक नहीं रही हैं. बुधवार को कुछ हमलावरों ने दो महिलाओं को जिंदा जला दिया. ट्रक-चालकों का इनकार दूसरी ओर बिहार की सीमा पर पिछले पाँच दिन से असम जाने वाले हज़ारों ट्रक रुके खड़े हैं क्योंकि ड्राइवरों ने वहाँ जाने से इनकार कर दिया है. इनमें से अधिकतर हिंदी भाषी हैं और वे ज़रूरत का सामान असम ले जाने से कतरा रहे हैं. बिहार मोटर परिवहन संघ के अध्यक्ष उदय शंकर प्रसाद सिंह ने बीबीसी से कहा कि ट्रकों की यह हड़ताल तभी समाप्त होगी यदि असम में बिहारियों को पूरी सुरक्षा संबंधी गारंटी मिलेगी. इस कार्रवाई से छह अन्य पूर्वोत्तर राज्यों को भी सामान नहीं पहुँच पा रहा है क्योंकि वहाँ पहुँचने के लिए भी असम से होकर गुज़रना पड़ता है. कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि यदि यह समस्या जल्दी नहीं सुलझी तो कई राज्यों में ज़रूरत की चीज़ों का अभाव हो जाएगा. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||