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मंगलवार, 25 नवंबर, 2003 को 23:48 GMT तक के समाचार
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क्या युद्धविराम प्रभावी रह पाएगा?

वाघा सीमा
भारत और पाकिस्तान ने युद्धविराम की घोषणा की है

भारत और पाकिस्तान के जम्मू कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा, नियंत्रण रेखा और सियाचिन ग्लेशियर में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर संघर्षविराम लागू करने के फ़ैसला का अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ज़ोरदार स्वागत किया है.

दुनिया भर के देश चाहते हैं कि दोनों देशों के संबंध बेहतर बनें क्योंकि परमाणु हथियारों से सुसज्जित दोनों देशों को बीच संघर्ष के ख़तरे से सभी वाकिफ़ हैं.

लेकिन दोनों देश इससे राजनीतिक लाभ उठाने के फेर में नज़र आते हैं.

पहले पाकिस्तान ने कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर संघर्षविराम का प्रस्ताव रखा था.

उसके बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा, नियंत्रण रेखा और सियाचिन में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम लागू करने का प्रस्ताव रखा.

लगता है कि दोनों पक्ष किसी को मौक़ा नहीं देना चाहते और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ख़ासकर अमरीका के सामने अपने आपको शांति का पक्षधर दिखाना चाहते हैं.

दोनों देश ये दिखाना चाहते हैं कि वे समाधान के लिए भारी प्रयास कर रहे हैं जबकि पड़ोसी देश उनके धैर्य की कड़ी परीक्षा कर रहा है.

भले ही ये सारी कवायद लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने के बजाए अंतरराष्ट्रीय जनसंपर्क का हिस्सा हो,फिर भी ये एक अच्छी ख़बर है.

सन् 2001 में आगरा सम्मेलन के असफल होने के बाद दोनों देशों के बीच माहौल पहली बार इतना बेहतर हुआ है.

और 18 महीने पहले तो दोनों देशों के संबंध इतने ख़राब हो गए थे कि वे युद्ध के कगार पर पहुँच गए थे.

अब जनवरी में सार्क सम्मेलन होने वाला है और उसमें भारत-पाकिस्तान तनाव से हटकर कारोबार के मुद्दे पर बातचीत हो पाएगी.

कारोबार और परिवहन के मुद्दों में छूट से ऐसा माहौल बना है कि लगने लगा है कि दोनों देशों के रिश्तों में प्रगति संभव है.

रिश्ते

हालांकि सुर बदल गए हैं लेकिन युद्धविराम से अभी बहुत दूर तक जाना है.

वैसे भी जाड़ों में सीमा पर गतिविधियाँ कम हो जाती हैं और कम झड़पें होती हैं.

कश्मीर में संकट का समय मई होता है जब बर्फ पिघलती है और चरमपंथी भारत प्रशासित कश्मीर में घुसपैठ करने लगते हैं.

युद्धविराम की असली परीक्षा तब होगी जब गर्मियों में बर्फ पिघलने लगेगी और उस समय भारत की ओर से यदि चरमपंथियों की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अवैध गतिविधियों की ख़बरें आईं तो उनका क्या असर होगा.

अभी तक विरोध के असली मुद्दों पर कोई प्रगति नहीं हुई है.

मसलन, भारत के इस आरोप पर कि पाकिस्तान चरमपंथियों को समर्थन जारी रखे हुए है जबकि पाकिस्तान इससे इनकार करता आया है.

जब तक ऐसे बड़े मुद्दों पर प्रगति नहीं होगी तब तक कश्मीर और शत्रुता को स्थाई रूप से समाप्ति पर प्रगति संभव होती मुश्किल नज़र आती है.

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