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अब कपड़े पर पड़ेगी महँगाई की मार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया भर में खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने का बाद अब बारी है कपड़ों की. कपड़े बनाने वाली कंपनियों का कहना है कि अमरीका और यूरोप में कपड़ों की माँग में गिरावट आई है, क्योंकि वहां लोगों ने कपड़ों पर पैसा ख़र्च करना कम कर दिया है. एक अनुमान के मुताबिक अमरीका में कपास की माँग में पिछले वर्ष के मुक़ाबले साढ़े छह फ़ीसदी की गिरावट आएगी और यह गिरकर एक मिलियन टन के आसपास रह जाएगी. दूसरी तरफ़ यूरोपीय संघ में भी कपास की माँग में 11 फ़ीसदी तक की कमी आ सकती है. कपास के दाम में गिरावट की मुख्य वजह कच्चे माल और तेल के दामों में बढ़ोत्तरी को माना जा रहा है. इससे सामान को विदेशी बाज़ार तक पहुँचाने के ख़र्च में भी बढ़ोत्तरी हुई है. भारत में हस्तकरघा उद्योग संकट में है. चीन में भी कपड़ा उद्योग मुश्किलों से गुजर रहा है. अमरीका के बाज़ार अमरीका में कपास की खेती करने वाले किसान अब दूसरी फ़सलों जैसे गेहूँ, सोयबीन और मक्के की ओर रुख करने लगे हैं. इन फ़सलों से किसानो को ज़्यादा मुनाफ़ा हो रहा है.
कपास के दाम में बढ़ोत्तरी की वजहें तलाशना मुश्किल नहीं है. सब्सिडी, जैविक इंधन की बढ़ती माँग और बाज़ार की अस्थिरता को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है. अमरीका के एक ब्रोकर के अनुसार दूसरी वस्तुओं के दाम बढ़ने से कपास के दाम भी अछूते नहीं रह सकते. महंगा कपास अंतरराष्ट्रीय कपास परामर्श समिति का कहना है कि कुछ वर्षों में अमरीका में कपास की खेती होने वाले क्षेत्र में 15 फ़ीसदी की गिरावट हो सकती है. अमरीका में वर्ष 2006 में 15 मिलियन एकड़ में कपास उगाया जाता था. इसके अगले साल कपास की पैदावार 10.8 मिलियन एकड़ में हुई. अब यह घटकर 9.5 एकड़ हो गई है. कपास की कमी सबसे पहले पिछले वर्ष नज़र आई, जब कपास की माँग और आपूर्ति में दस लाख टन का फ़र्क था. एक तरफ़ जहाँ अमरीका में कपास की खेती घट रही है, चीन, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील और पश्चिम अफ्रीका में कपास की पैदावार में तीन फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी होगी. लेकिन ये बढ़ोत्तरी नाकाफ़ी है. |
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