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गुरुवार, 13 दिसंबर, 2007 को 11:16 GMT तक के समाचार
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'पुरानी बातचीत निजी अनुभवों की डायरी'
बीबीसी
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस अगले सप्ताह अपनी 75वीं वर्षगांठ मना रहा है
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस अगले सप्ताह अपनी 75वीं वर्षगांठ मना रहा है. इस मौके पर बीबीसी ने कुछ ऐसे श्रोताओं से बात की है जो विभिन्न कारणों से पत्रकारों की नज़र में रहे.

इन्हीं में से एक है श्रीलंका की श्रीदेवी राघवन. श्रीदेवी ने बीबीसी से 1995 में बात की थी जब वो 19 वर्ष की थी और छात्रा थीं.

उस समय बॉर्न अ गर्ल नाम की सिरीज़ चल रही थी. इसके बाद बीबीसी ने श्रीदेवी से वर्ष 2000 और 2005 में फिर बात की- ये जानने के लिए कि उसकी ज़िंदगी में क्या बदलाव आए हैं.

पेश है बीबीसी के एंड्रिया क्रोसन से श्रीदेवी की बातचीत के मुख्य अंश:

वर्ष 1995 में पहली बार आपकी आवाज़ प्रसारित हुई थी, अब सोचकर कैसा लगता है?

मुझे ऐसा लगा जैसे मैं सचमुच एक बच्ची हूं. यह बहुत ही रोचक है क्योंकि मैने बहुत सी बातें कहीं जो बहुत ही बचकानी सी लगीं. लेकिन मुझे बेहद खुशी है कि मुझमें ये सब है. मैं अपनी बहुत सी धारणाओं और मान्यताओं को अपने सामने अमल होते हुए देख सकती हूं और मेरे लिए ये बहुत मायने रखता है.

आपकी ज़िंदगी में इस बात काफ़ी कुछ हुआ- आपने करियर बदला, फिर शादी हुई. इस सब के बारे में रिपोर्ट करने से आपने किसी तरह का दवाब महसूस किया?

यह कहना मुश्किल है. सच कहूँ तो, मुझे ऐसा लगता है कि जैसे यह मेरे निजी अनुभवों की डायरी है. और मुझ पर सही या गलत फ़ैसला लेने के बावजूद कोई राय नहीं बनाई जाती. मैं जैसे-जैसे चल रही हूं, सिर्फ़ अपने जीवन की कहानी, अपने विचार और अपने अनुभव बांट रही हूँ. उस लिहाज़ से मुझ पर कोई दबाव नहीं है.

लेकिन फिर भी मैं उस समय जो महसूस करती हूं उसे बताने में थोड़ा सा असहज महसूस होता है. जैसे मान लिजिए कि यह इंटरव्यू उस समय होता जब मैं अपनी नौकरी छोड़ कर दूसरे व्यवसाय में जाने के बारे में सोच रही थी, तो मेरे लिए यह एक बहुत ही निजी फ़ैसले का वक़्त था. उस समय मैं पूरी तरह से अपने विचार व्यक्त नहीं कर पाती.

आपने अपने जीवन की बातें इस तरह जग-ज़ाहिर की. क्या दोबारा ऐसा करने के बारे में सोचेंगी?

हाँ, मैं ऐसा ज़रुर करूँगी. लेकिन फिर मैं सोचती हूँ कि अगर मैं ज़िंदगी में वहाँ नहीं पहुंच पाती जहाँ मैने सोचा था, तब भी क्या मैं ऐसा ही महसूस कर पाती? क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि ऐसे लोग जो अपने तय किये गए लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते, वे काफ़ी दबाव महसूस करते हैं.

सफल होने के बाद अपनी खुशी और अनुभवों के बारे में बात करने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है अपनी विफलता के बारे में बात करना. अगर मेरे जीवन में भी बड़ी रुकावटें आईं होतीं और उन्होंने मेरे सोचने का तरीका बदल दिया होता ... तो मैं कह नहीं सकती कि तब भी मैं ऐसी ही सोच रखती या नहीं.

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