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मंगलवार, 28 अगस्त, 2007 को 15:05 GMT तक के समाचार
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अब्दुल्ला गुल तुर्की के नए राष्ट्रपति बने
अब्दुल्ला गुल
अब्दुल्ला गुल ने कहा है वे तुर्की के सभी लोगों के लिए काम करेंगे
तुर्की के विदेश मंत्री अब्दुल्ला गुल संसदीय मतदान के बाद देश के नए राष्ट्रपति चुने गए हैं.

वे पहले ऐसे राजनेता हैं जिनकी इस्लामिक पृष्ठभूमि हैं और जो तुर्की के राष्ट्रपति चुने गए हैं.

तुर्की गणराज्य की स्थापना धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के आधार पर 1923 में की गई थी.

एक पार्टी के अब्दुल्ला गुल तीसरे दौर की मतगणना के बाद चुने गए हैं.

देश के कई धर्मनिरपेक्ष दलों, सेना के जनरलों और विपक्षी पार्टियों ने अब्दुल्ला गुल की उम्मीदवारी का विरोध किया था.

उनका कहना था कि अब्दुल्ला गुल देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के लिए ख़तरा हैं.

तुर्की की संसद में 550 सीटें हैं और अब्दुल्ला गुल को मतदान में 339 सीटें मिली हैं. तीसरे दौर में जीतने के लिए अब्दुल्ला गुल को 276 सीटें चाहिए थी.

इसके पहले को दो चरणों में अब्दुल्ला गुल को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया था जो जीतने के लिए ज़रूरी था.

उन्होंने कहा है कि वे तुर्की के सभी लोगों के लिए काम करेंगे. उनकी पहचान एक वरिष्ठ कूटनयिक के तौर पर है जिन्होंने यूरोपीय संघ में शामिल होने के लिए तुर्की की बातचीत में योगदान दिया है.

अब्दुल्ला गुल की पत्नी ने भी कहा है कि वे तुर्की की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति का सम्मान करेंगी. वे सर पर स्कार्फ़ बाँधती हैं और इसे लेकर उनकी काफ़ी आलोचना हुई है.

सेना की चिंता

सर पर स्कार्फ़ बाँधने के लिए अब्दुल्ला गुल की पत्नी की काफ़ी आलोचना हुई है

वहीं तुर्की की सेना के प्रमुख ने सोमवार को कहा है कि 'बुरी ताकतें देश को नुकसान पहुंचाने' की कोशिश कर रही हैं.

जनरल यासर ने किसी का नाम नहीं लिया और कहा कि कुछ ताकतें तुर्की के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं.

लेकिन जानकारों का कहना है कि ये बयान साफ़ तौर पर अब्दुल्ला गुल को निशाना बनाकर दिया गया है.

पिछले कुछ महीनों में सेना की ओर से ये दूसरी चेतावनी थी.

तुर्की में सेना पिछले 60 वर्षों में चार सरकारों को सत्ता से बाहर कर चुकी है.

अप्रैल में राष्ट्रपति पद के मतदान के पहले चरण में अब्दुल्ला गुल काफ़ी कम अंतर से बहुमत हासिल करने से चूक गए थे और तभी से सेना चिंता जता रही है.

धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं ने भी कई जगह प्रदर्शन किए थे.

तुर्की की स्थापना करने वाले नेता मुस्तफ़ा अतातुर्क ने कहा था कि सार्वजनिक जीवन पर धर्म का प्रभाव नहीं होना चाहिए.

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