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रविवार, 01 अप्रैल, 2007 को 19:03 GMT तक के समाचार
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दिलो दिमाग में हमेशा रहेगा संयुक्त राष्ट्र
महासचिव बान की मून ( बाएं) के साथ शशि थरुर
बान की मून के खिलाफ महासचिव पद की दौड़ में थे शशि थरुर
संयुक्त राष्ट्र को दिल और दिमाग में हमेशा बनाए रखने के संकल्प के साथ भारी मन से संयुक्त राष्ट्र के उपमहासचिव और महासचिव पद की दौड़ में रह चुके शशि थरुर ने संयुक्त राष्ट्र को अलविदा कह दिया.

संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में अपने अंतिम दिन विदाई समारोह में थरुर ने कहा " संयुक्त राष्ट्र का एक हिस्सा मेरे दिल और दिमाग़ में हमेशा रहेगा.”

उपमहासचिव के रुप में संचार और जनसूचना विभाग के प्रमुख थरुर संयुक्त राष्ट्र से पिछले तीस सालों से जुड़े हुए थे.

महासचिव पद की दौड़ में हार जाने के बाद पिछले महीने उन्होने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

पहली अप्रैल से जापान के राजनयिक कियोताका आसाताका उनके पद यानी जनसूचना विभाग का कार्यभार संभालेंगे.

 मैं 51 साल का हूं और पिछले करीब तीस सालों से मैं संयुक्त राष्ट्र के काम में ही लगा हूं. इस संस्था ने विचारात्मक तौर पर मेरे व्यक्तित्व को आकार दिया है, और मैंने अपनी सलाहियतों में भी निपुणता इसी संस्थान के ज़रिए पाई है
शशि थरुर

शशि थरूर संयुक्त राष्ट्र के लोकप्रिय कर्मचारियों मे से थे औऱ इसका उदाहरण तब देखने में आया जब संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों ने उन्हे आखिरी बार अलविदा कहा.

शुक्रवार की रात संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों ने शशि थरूर को अलविदा कहने के लिए एक पार्टी का आयोजन किया जिसमें सैकड़ों की तादाद में शामिल हुए इन लोगों ने भावभीनी विदाई दी.

इस मौके पर भावुक शशि थरूर ने कहा कि उनके लिए यह एक बेहद भावनात्मक और उदास मौका है कि उन्हे इस संस्था को छोड़कर जाना पड़ रहा है जिसमें वह पिछले तीस सालों से काम करते आए थे.

योगदान

वह बोले, “मैं 51 साल का हूं और पिछले करीब तीस सालों से मैं संयुक्त राष्ट्र के काम में ही लगा हूं. इस संस्था ने विचारात्मक तौर पर मेरे व्यक्तित्व को आकार दिया है, और मैंने अपनी सलाहियतों में भी निपुणता इसी संस्थान के ज़रिए पाई है. औऱ मुझे उम्मीद है कि मैंने जितना समय यहां बिताया है उस दौरान मैंने भी संयुक्त राष्ट्र के लिए कुछ योगदान दिया.

सहयोगियों के साथ थरुर
अपने सहयोगियों में बेहद लोकप्रिय थे थरुर

थरुर का कहना था " मुझे इससे अलग होने पर अफ़सोस तो है लेकिन यह भी भरोसा है कि यह संस्थान अपना काम जारी रखेगा और हमारे समर्थन के काबिल रहेगा.”

इसमें संचार और जनसूचना विभाग के कर्मचारी भी भारी तादाद में शामिल थे जहां शशि थरूर मुखिया थे.

थरूर के दफ़्तर में काम करने वाली नार्वे की एक महिला कर्मचारी एलिज़ाबेथ आंखों में आंसू भरे रूंधे गले से बोलीं, “शशि एक बेहतरीन इंसान औऱ एक बेहतरीन अफ़सर हैं जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है. हम ऐसा अधिकारी संयुक्त राष्ट्र में फ़िर कभी नहीं पाएंगे.”

इस विदाई समारोह में नए महासचिव बान की मून के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ और संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व राजदूत विजय नांबियार भी मौजूद थे.

शशि थरुर पहले ही कह चुके हैं कि संयुक्त राष्ट्र में उन्हें उनकी मेहनत का सिला नहीं मिला.

अपने विदाई समारोह के बाद बीबीसी हिंदी से खास बातचीत में थरूर ने कहा कि उन्हे संयुक्त राष्ट्र में काम करने में कोई परेशानी नहीं थी लेकिन महासचिव पद की दौड़ में नाकाम होने के बाद ऐसे हालात पैदा हो गए थे कि उन्हें संयुक्त राष्ट्र छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा.

थरूर ने कहा कि उन्हे संयुक्त राष्ट्र में काम करते हुए कुछ निराशा के क्षण ज़रूर देखने को मिले लेकिन कुल मिलाकर वह संयुक्त राष्ट्र के अब तक के काम से संतुष्ट हैं.

उन्होंने कहा, “देखिए जब तक इंसान दुनिया में हैं तो लड़ाई मार, विवाद औऱ हादसे तो चलते ही रहेंगे लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने काफ़ी हद तक विश्व शांति कायम रखने में अपना अहम किरदार निभाया है. औऱ मैं इसी लिए आशावान हूं कि संयुक्त राष्ट्र अपनी भूनिका निभाता रहेगा.”

छवि बदली

मित्रों के साथ थरुर
थरुर ने संयुक्त राष्ट्र में काम करते हुए कई किताबें भी लिखी हैं

थरूर कहते हैं कि पिछले तीस सालों में संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न विभागों में काम करते हुए उनके दिमाग़ में संयुक्त राष्ट्र की छवि काफ़ी बदली है.

वह कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र को उन्होनें खुद बदलते देखा है औऱ उसका विकास होते देखा है जिससे नई चुनौतियों का सामना करने की क्षमता भी बढ़ी है. थरूर ने संयुक्त राष्ट्र में सुधारों पर भी ज़ोर दिया औऱ उम्मीद जताई कि इसमें औऱ सुधार लाए जाएंगे.

इस मामले में वह महात्मा गांधी के कथन का सहारा लेते हुए कहते हैं, “महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि आप खुद वह बदलाव अपने आप में लाएं जो बदलाव आप विश्व में देखना चाहते हैं. और मैं समझता हूं कि संयुक्त राष्ट्र इससे कोई भिन्न नहीं है. अगर हम विश्व में बदलाव देखना चाहते हैं तो हमें अपने आप को भी बदलना होगा.”

शशि थरुर ने 1978 में संयुक्त राष्ट्र में काम करना शुरू किया था. करीब तीस सालों में उन्होनें शरणार्थी विभाग, शांति दलों, महासचिव के कार्यालय, जैसे विभिन्न क्षेत्रों में काम किया है. औऱ उनके काम को काफ़ी सराहा भी गया था.

पिछले साल महासचिव पद के चुनाव की दौड़ में वह भारत की ओर से उम्मीदवार भी थे. लेकिन उन्हें दक्षिण कोरियाई राजनयिक बान की मून ने उस समय शिकस्त दी जब सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सद्सयों में से एक ने थरूर के खिलाफ़ वोट किया.

थरूर ने कहा कि उनको भारत सरकार की ओर से अभी तक किसी पद का न्योता नहीं आया है. लेकिन उन्होनें इशारा ज़रूर दिया है कि वह भारत सरकार द्वारा कोई पद दिए जाने के लिए न्योता स्वीकार कर सकते हैं.

अपने भविष्य के काम के बारे में थरूर का कहना था कि वह अब कुछ दिन तक स्वतंत्र तौर पर काम करेंगे. उनका कहना है कि वह मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में कुछ निजी कंपनियों के साथ मिलकर इस इलाके में पूंजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे.

शशि थरुर लेखक भी हैं और उन्होंने नौ किताबें लिखी हैं. अब वह एक और किताब पर काम कर रहे हैं जो इस साल के आखिर में बाज़ार में आ जाएगी.

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