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अली अब्बास के बेमिसाल अनुभव | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ के अली अब्बास केवल बारह वर्ष के थे जब चार साल पहले मार्च 2003 में बग़दाद पर हुए एक मिसाइल हमले में उन्होंने दोनों हाथ खो दिए. बमबारी में उनके माता-पिता समेत 16 रिश्तेदार भी मारे गए. कुवैत में उनका इलाज हुआ जिसके बाद उन्हें ब्रिटेन लाया गया जहाँ वे लंदन के एक स्कूल में मुफ़्त शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने बमबारी के बाद होश संभालने से लेकर लंदन में अपने जीवन के बारे में अनुभव इस प्रकार बयान किए: "जब मैं इराक़ के अस्पताल में था तब तो किसी अलग सी दुनिया में था. उपचार के साधन बहुत सीमित थे और अस्पताल बहुत ही ख़राब स्थिति में था. दर्द इतना ज़्यादा था कि मैं उस समय जीवित रहने से मौत को ही बेहतर समझता. जब मुझे कुवैत ले जाया गया तब मुझे अहसास हुआ कि मैरे दोनों हाथ नहीं हैं. मुझे तब और ज़्यादा धक्का लगा जब मुझे पता चला कि मेरा पूरा परिवार नहीं रहा. ऐसे दुख से तो शायद आप कभी उबर ही नहीं पाते. मुझे अब भी अपने परिवार की याद आती है. मैं अब भी उन लोगों को दोषी मानता हूँ जिन्होंने मेरे घर पर बमबारी की थी. ये इसलिए क्योंकि जब बमबारी हुई तब वहाँ कोई सैनिक या हथियार नहीं थे. हम लोग किसान थे और हमारे पास गाय, भेड़ थीं. 'अब सामान्य जीवन' हमारे घर पर बमबारी होने का कोई कारण नहीं था. मुझे लगता है कि ये सोच-समझकर किया गया और ये कोई ग़लती नहीं थी. कभी-कभी मैं सरकार को दोष देता हूँ लेकिन यहाँ के लोगों का व्यवहार मेरे साथ बहुत अच्छा रहा है. अब मेरा जीवन अच्छा है, सामान्य है. मैं फ़ुटबॉल खेलता हूँ. पेंटिंग करता हूँ और साइकिल चलाता हूँ. मेरा बहुत अच्छा स्कूल है, मेरे शिक्षक और दोस्त बहुत अच्छे हैं कुवैत में ही मेरे डाक्टर ने मुझे सिखाया कि पैरों से खाना कैसे खाया जा सकता है और दाँत कैसे साफ़ किए जा सकते हैं. पहले पहल तो ये बहुत ही कठिन था. लेकिन मैं लगातार कोशिश करता रहा ताकि मैं पैरों के इस्तेमाल से ये काम कर सकूँ. ये वैसा ही है जैसा कि हाथों को इस्तेमाल करना; यदि मेरे हाथ होते तब. पैरों से पेंटिंग जब मैं कुवैत में अस्पताल में था तो डॉक्टर ने मुझे अपने पैरों से पेंटिंग करना सिखाया. ये तो बहुत ही मुश्किल था और मुझे लगा कि मेरे लिए ऐसा करना कभी संभव ही नहीं होगा. पेंटिंग और वो भी पैरों से? अब मैं पेंटिंग काफ़ी कुशलता से कर सकता हूँ. मैने ख़ुद का एक पोर्ट्रेट बनाया और फिर अपने शिक्षक का भी बनाया.
दो-तीन महीने पहले एक गैलरी में प्रदर्शनी भी लगाई और कुछ पेंटिंग बिक भी गए. इससे मिला कुछ पैसा एक समाजसेवी संस्था को गया और कुछ पैसा मुझे भी मिला. मेरे कृत्रिम हाथ काफ़ी फ़ायदेमंद हैं लेकिन मैं ज़्यादा इस्तेमाल अपने पैरों का ही करता हूँ. फुटबॉल खेलना मुझे बेहद पसंद है और पसंदीदा टीम है मैनचेस्टर युनाईटेड. विशेष तरह से बनाए गए अपने तिपहिया मोटर से मैने पिछले साल ऑक्सफर्ड तक 60 मील की दूरी भी तय की. काफ़ी थकान हुई और उसके बाद तो मैं सीधे सोने चला गया. मेरा लक्ष्य? मुझे पता नहीं कि क्या बनना चाहता हूँ. शायद बड़ा होकर शांति और अमन के लिए कुछ करना चाहूँ. उम्मीद है कि इराक़ एक सुरक्षित जगह बने ताकि मैं वापस जा सकूँ और वहाँ जाकर रह सकूँ." | इससे जुड़ी ख़बरें मंडेला एक अनूठे चित्रकार भी27 सितंबर, 2002 | पहला पन्ना ड्राइवर बना नामी फ्रांसीसी पेंटर07 सितंबर, 2003 | पहला पन्ना ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर युद्ध विरोधी प्रदर्शन24 फ़रवरी, 2007 | पहला पन्ना उम्मीद से हताशा तक का सफ़र19 मार्च, 2007 | पहला पन्ना 'इराक़ी शरणार्थियों की अनदेखी'20 मार्च, 2007 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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