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'इराक़ के लिए बलिदान देने को तैयार हूँ' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने कहा है उनकी मौत इराक़ के लिए 'बलिदान' होगा. इस बीच उन्हें मौत की सज़ा का विरोध बढ़ता जा रहा है. जेल से लिखी एक चिट्ठी में सद्दाम हुसैन ने कहा है कि उनकी मौत उन्हें 'सच्चा शहीद' बना देगी. चिट्ठी में उन्होंने लिखा है, "मैं बलिदान देने के लिए तैयार हूँ. अगर ख़ुदा ने चाहा तो वो मुझे सच्चे शहीदों के बीच रखेंगे." माना जा रहा है कि ये पत्र उन्होंने नंवबर में मौत की सज़ा दिए जाने के कुछ देर बाद लिखा था. सद्दाम हुसैन को 30 दिनों में फाँसी दिए जाने के फ़ैसले का अमरीका ने स्वागत किया है जबकि यूरोपीय संघ ने आग्रह किया है कि मौत की सज़ा न दी जाए. इराक़ में अपील सुनने वाली अदालत ने मंगलवार को आदेश सुनाया था कि सद्दाम हुसैन मानवता के ख़िलाफ़ अपराध करने के दोषी हैं और उन्हें मौत की सज़ा दी जाएगी. विरोध इस बीच सद्दाम हुसैन को मौत की सज़ा देने के फ़ैसले का विरोध बढ़ता जा रहा है. इटली के प्रधानमंत्री रोमानो प्रोदी ने इसकी निंदा की है. उन्होंने कहा कि उनका देश मौत की सज़ा न दिए जाने के पक्ष में है. प्रोदी ने कहा कि इस बयान से उनका मकसद सद्दाम हुसैन के कथित अपराधों को कम कर आँकना या इराक़ी संस्थाओं में अविश्वास जताना नहीं है. भारत ने भी मौत की सज़ा बरकरार रखने के अपीलीय अदालत के फ़ैसले पर चिंता जताई है. विदेश विभाग ने मंगलवार को जारी व्यक्तव्य में कहा कि इस तरह की कोशिश होनी चाहिए की सद्दाम हुसैन को मौत की सज़ा न हो. अब सद्दाम हुसैन को कभी भी फाँसी दी जा सकती है. लेकिन कई मानवाधिकार संगठनों ने उनके मुकदमे की वैधता पर सवाल उठाए हैं. उधर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि उसे उम्मीद है कि पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फाँसी की सज़ा नहीं दी जाएगी. भारत सरकार ने अपने बयान में ये भी कहा है कि उसे उम्मीद है कि ऐसे कोई कदम नहीं उठाए जाएँगे जिनसे इराक़ में आपसी मैत्री की प्रक्रिया में बाधा आए और वहाँ शांति कायम करने में और देर हो. और अपील नहीं
पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को एक इराक़ी अदालत ने पाँच नवंबर को मौत की सज़ा सुनाई थी जिसके ख़िलाफ़ उनकी अपील ख़ारिज कर दी गई.. इसके बाद इराक़ी क़ानून के तहत आगे अपील करने का प्रावधान नहीं है और तीस दिन के भीतर इस आदेश का पालन करना अनिवार्य है. अपील जज आरिफ़ शाहीन ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था, "तीस दिन की समयसीमा आगे नहीं बढ़ाई जा सकती. कल (यानि बुधवार) से किसी भी समय इस आदेश का पालन हो सकता है." महत्वपूर्ण है कि अपील कोर्ट के फ़ैसले की राष्ट्रपति जलाल तालाबानी ने पुष्टि करनी है लेकिन अपील कोर्ट के जज का कहना था कि सद्दाम हुसैन की सज़ा घटाई नहीं जा सकती. सद्दाम हुसैन के दो सहयोगियों- बर्ज़ान अल-तिकरिती और अवाद अल-बांदार की अपील भी ख़ारिज कर दी गई है. इन तीनों को 1982 में दुजैल नरसंहार के मामले में फाँसी की सज़ा सुनाई थी. उस नरसंहार में 148 शिया मारे गए थे. हत्या का मामला शियाओं को निशाना तब बनाया गया था जब सद्दाम हुसैन पर 1982 में जनालेवा हमले की कोशिश हुई थी. सद्दाम हुसैन के वकील ख़ालील अल-दुलैमी का कहना था कि सद्दाम को मौत की सज़ा देन से इराक़ में सांप्रदायिक हिंसा और बढ़ेगी. उनका कहना था, "हमें आश्चर्य नहीं हुआ है. हमें पूरा यकीन हो गया है कि ये 100 प्रतिशत राजनीतिक मुकदमा था." बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ये माना जा रहा है कि सद्दाम और उनके सहयोगियों को फाँसी अज्ञात समय और जगह पर दी जाएगी. उनका कहना है कि हो सकता है कि फाँसी दिए जाने के बाद ही पता चले कि ऐसा हो गया है. उनके अनुसार सद्दाम को फाँसी देने से उनके समर्थकों में रोष भरी प्रतिक्रिया हो सकती है.सद्दाम के ख़िलाफ़ कुछ अन्य मामले भी चल रहे हैं. |
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