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सोमवार, 23 जनवरी, 2006 को 10:40 GMT तक के समाचार
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कुवैत में अमीर पर संसदीय बहस
कुवैत के राजनीतिक दल
अमीर के पद के लिए मतभेद उभर गए हैं
कुवैत के मंत्रिमंडल ने संसद से औपचारिक रूप से कहा है कि वह नए अमीर को सत्ता से हटाने के लिए बहस कराए.

शेख़ साद अल अब्दुल्ला ने अपने चचेरे भाई के निधन के बाद एक सप्ताह पहले ही सत्ता संभाली थी लेकिन उनके विरोधियों का कहना है कि वह इतने बीमार हैं कि अमीर की ज़िम्मेदारी नहीं संभाल सकते.

शेख़ साद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अमीर बने रहना चाहते हैं, हालाँकि कुवैत के सार्वजनिक जीवन में अनेक वर्षों से उनकी कम ही भूमिका रही है.

कुवैत का मंत्रिमंडल और सत्तारूढ़ अल सबाह परिवार के अनेक सदस्य प्रधानमंत्री शेख़ सबाह अल अहमद के समर्थक हैं. सबाह अल अहमद को वास्तविक शासक माना जाता है.

संसद के स्पीकर जासम ख़ोरफ़ी ने कहा, "हाँ, मुझे पत्र मिल गया है." लेकिन उन्होंने इस बारे में ज़्यादा जानकारी देने से इनकार कर दिया.

संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार अगर मंत्रिमंडल इस तरह का औपचारिक अनुरोध करता है तो संसद को एक बीमार अमीर को सत्ता से हटाने के लिए मतदान के ज़रिए राय लेनी होती है और इसके लिए दो तिहाई का बहुमत मिलना चाहिए.

शाही परिवार

संभावना है कि संसद में मंगलवार को इस मुद्दे पर मतदान होगा. मंगलवार को ही बीमार शेख़ साद को पद की शपथ दिलाई जानी है लेकिन संसद उससे कुछ घंटे पहले ही मतदान करेगी.

शेख़ सबाह अल अहमद
शेख़ अल सबाह कई वर्षों से सत्ता में सक्रिय रहे हैं

अगर नए अमीर को सत्ता से बाहर करने के लिए संसद में बहुमत से मतदान होता है तो यह इस तरह का पहला मामला होगा कि किसी अमीर को संसद ने बहुमत के ज़रिए सत्ता से हटाया हो.

संसद में 50 निर्वाचित सीटें हैं जिनमें से 15 सदस्य मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं. मंत्रिमंडल में सबाह परिवार का बहुमत है.

76 वर्षीय शेख़ साद कई वर्षों से पूर्व अमीर शेख़ जाबर अल अहमद के मातहत क्राउन प्रिंस रहे हैं लेकिन सरकारी मामलों में शेख़ सबाह अल अहमद पर ही ज़िम्मेदारी रहती थी. शेख़ सबाह अल अहमद अमीर के भाई लगते हैं.

कुवैत में शाही परिवार की परंपरा के मुताबिक अमीर का पद दो मुख्य शाही परिवारों के बीच बारी-बारी से रहना चाहिए.

एक जाबर परिवार है जिससे शेख़ सबाह हैं और दिवंगत अमीर भी इसी परिवार से थे. दूसरा सालेम परिवार है जिससे शेख़ साद हैं.

शेख़ साद के समर्थकों ने जगह-जगह उनकी तारीफ़ में पोस्टर छापे हैं जिनमें उन्हें 1990-91 के खाड़ी युद्ध का हवाला देते हुए कुवैत की आज़ादी का हीरो दिखाया गया.

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