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संविधान पर अब तक सहमति नहीं | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ के विभिन्न समुदायों के बीच संविधान के मसौदे पर अब तक कोई सहमति नहीं बन पाई है. मसौदा तैयार करने की समयसीमा ख़त्म होने में सिर्फ़ 36 घंटे का वक़्त बचा है. इसके चलते अधिकारियों को अब समयसीमा आगे बढ़ाने पर सोचना पड़ रहा है. इतना ही नहीं संसद भंग करने जैसा क़दम उठाने पर सोचा जा रहा है. इराक़ी प्रधानमंत्री के प्रवक्ता लीथ कुब्बा ने कहा कि अगर मसौदा तैयार नहीं हो पाता है तो एक विकल्प ये है कि समयसीमा एक हफ़्ता और बढ़ा दी जाए. उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं होता है तो नेशनल असेंबली को भंग कर दिया जाएगा. संवाददाताओं के मुताबिक़ नए सिरे से चुनाव करवाने के लिए ज़्यादातर लोग तैयार नहीं है इसलिए आसार इस बात के हैं कि अगर मसौदा तैयार नहीं होता है तो समयसीमा बढ़ा दी जाएगी. संघीय ढाँचे, इस्लाम की भूमिका और तेल के बटवारे को लेकर शिया, सुन्नी और कुर्द समुदाय के सदस्य सहमत नहीं है. मसौदा तय करने की वास्तविक तारीख़ पिछले हफ़्ते से बढ़ाकर सोमवार आधी रात तक के लिए बढ़ा दी गई थी. इस मुद्दे को लेकर अमरीका बार-बार मसौदा समय पर तैयार करने की बात करता रहा है क्योंकि वो इसे इराक़ में स्थायित्व लाने का एक तरीक़ा मानता है. लेकिन सुन्नी समुदाय के एक सदस्य ने कहा है कि अमरीका ज़रूरत से ज़्यादा दबाव डाल रहा है. अधिकारियों का कहना है कि कुछ मुद्दों के लेकर तो विभिन्न समुदाय सहमत होते नज़र आ रहे हैं लेकिन पूरी तरह सहमति नहीं बन पाई है. इराक़ी प्रधानमंत्री के प्रवक्ता ने कहा," मतभेद कम हुए हैं और सब लोग चाहते हैं कि समझौता हो क्योंकि ये इराक़ के भविष्य के लिए ज़रूरी है." उत्तर में कुर्द और दक्षिण में शिया समुदाय को ज़्यादा स्वायत्ता देने का सुन्नी समुदाय विरोध कर रहा है. सुन्नी समुदाय को डर है कि ऐसा करने से उसे तेल से मिलने वाली आय क़म हो सकती है. संविधान के मसौदे को अक्तूबर में जनमतसंग्रह के लिए रखा जाना है. अगर इसे मंज़ूरी मिल जाती है तो दिसंबर के आसपास चुनाव करवाए जाएँगे. |
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