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सऊदी अरब में जबरन शादी पर रोक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सऊदी अरब के शीर्ष धार्मिक नेता ने महिलाओं की शादी जबरन कराए जाने की परंपरा पर रोक लगाने की घोषणा की है. प्रधान मुफ़्ती शेख़ अब्दुल अज़ीज़ अल-शेख़ ने इच्छा के विरुद्ध शादी को इस्लामी क़ानून के ख़िलाफ़ क़रार देते हुए कहा है कि इसके दोषी लोगों को जेल भेजा जाना चाहिए. मुख्य उलेमाओं की परिषद के प्रमुख शेख़ अब्दुल अज़ीज़ ने कहा, "किसी महिला को उसकी पसंद के ख़िलाफ़ किसी व्यक्ति से शादी करने के लिए बाध्य करना और उसे अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने नहीं देना, इस्लाम के तहत स्वीकार्य नहीं है." उन्होंने कहा कि अपनी लड़की को उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ शादी के लिए बाध्य करने वाले पिता को तब तक जेल में रखा जाना चाहिए जब तक कि वह अपनी राय बदल नहीं लेता. प्रधान मुफ़्ती की घोषणा को सऊदी अरब में महिलाओं को अधिकार दिलाने की दिशा में एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है. उल्लेखनीय है कि रूढ़ीवादी इस्लामी क़ानून वाले सऊदी समाज में महिलाओं पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगे हैं. उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं है और वे किसी सार्वजनिक पद के लिए उम्मीदवार नहीं बन सकती हैं. सऊदी अरब में महिलाओं को बुर्क़ा पहनना होता है और उन्हें अकेले यात्रा करने की इजाज़त नहीं है. वर्ष 2001 तक सऊदी अरब में महिलाओं को अपना अलग पहचान-पत्र नहीं दिया जाता था. माना जाता है कि सऊदी अरब में तलाक़ के मामलों की भारी संख्या के पीछे मुख्य कारण इच्छा-विरुद्ध शादियाँ हैं. एक अनुमान के अनुसार सऊदी अरब में हर दूसरी शादी का अंत तलाक़ में होता है. |
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