|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बाड़ लगाने का काम जारी रहेगाः इसराइल
इसराइल के उप प्रधानमंत्री यहूद ओल्मर्ट ने कहा है कि पश्चिमी तट पर बाड़ लगाने का काम जारी रहेगा. संयुक्त राष्ट्र महासभा में पारित एक प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने यह बात कही. पश्चिमी तट में इसराइल की ओर से बनाई जा रही सुरक्षा बाड़ का काम रोकने संबंधी प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में पारित हो गया है. पारित किए प्रस्ताव में ये भी कहा गया है कि अब लगाई गई बाड़ को भी तोड़ दिया जाए. मंगलवार को देर रात हुए इस मतदान में बाड़ का निर्माण रोकने और उसे गिराने के पक्ष में 144 मत पड़े जबकि सिर्फ़ चार मत उसके विरोध में थे. इस मामले में अंतिम सहमति तक पहुँचने में राजनयिकों को ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी. यूरोपीय संघ के देशों, फ़लस्तीनियों और अरब देशों के राजनयिकों के बीच काफ़ी देर तक इस बारे में चर्चा होती रही. इससे पहले प्रस्ताव का जो मसौदा था उसके अनुसार बाड़ को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया गया था और उसे हटाने की माँग की गई थी मगर लंबी चर्चा के बाद नए प्रस्ताव की भाषा थोड़ी नर्म रखी गई जिससे यूरोपीय संघ के देशों का समर्थन भी हासिल किया जा सके. इससे पहले अरब देशों के राजनयिक दो प्रस्तावों की माँग कर रहे थे. उनकी माँग थी कि एक प्रस्ताव के तहत इसराइल से बाड़ का निर्माण रोकने के लिए कहा जाए. जबकि दूसरे प्रस्ताव के तहत अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से इस निर्माण के बारे में जानकारी माँगी जानी थी. मगर यूरोपीय देशों को डर था कि ऐसे क़दम से अदालत की भूमिका का राजनीतिकरण हो सकता है. इसलिए वे चाहते थे कि एक प्रस्ताव को लेकर ही कोई समझौता हो जाए. संयुक्त राष्ट्र में बीबीसी संवाददाता ग्रेग बैरो का कहना है कि इस विवादास्पद प्रस्ताव पर समझौते का मामला संयुक्त राष्ट्र महासभा के हॉल से निकलकर उसके गलियारों तक पहुँच गया और लंबी चर्चा हुई. भाषा पर विवाद यूरोपीय संघ के देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनयिकों ने उस प्रस्ताव की भाषा को लेकर अरब देशों के राजनयिकों से मुलाक़ात भी की. इस पूरी प्रक्रिया का मक़सद सिर्फ़ किसी समझौते तक पहुँचना ही नहीं था बल्कि वे यह भी चाहते थे कि यूरोपीय संघ और अरब देशों के गुटों के बीच जो मतभेद हैं वे भी पूरी तरह दूर किए जा सकें. यूरोपीय संघ के कई देश मामले को अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत ले जाने की अरब देशों की माँग से चिंतित थे. इन देशों की चिंता थी कि इस मामले के अदालत जाने के बाद ये आरोप लगने लगेंगे कि अदालत की भूमिका का राजनीतिकरण हो रहा है. इसलिए वे पूरी तरह लामबंदी में लगे रहे कि किसी तरह ये प्रस्ताव नहीं रखा जाए, अंत में अरब देश एक ही प्रस्ताव रखने पर सहमत हो गए और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय वाला मुद्दा छोड़ दिया गया. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||