सलाखों के साए में ज़िंदगी

एक देश जो अमन का रास्ता तलाश रहा है और जहाँ खून खराबा रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई हैं. देखें सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक का हाल.

सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक
इमेज कैप्शन, सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक में दशकों तक सरकारी कामकाज के तौर तरीके सवालों के घेरे में रहे हैं और बीते एक साल में जातीय हिंसा के चले दौर ने लोगों के बीच असुरक्षा की भावना इस कदर पैदा हो गई है कि देश में बुनियादी सरकारी सुविधाएँ बदहाली के कगार पर पहुँच गई हैं. यहाँ बनी नई अंतरिम सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश के बुनियादी ढाँचे को पुनर्जीवित करने की है. उसे शांति और स्थायित्व की बहाली के लिए भी काम करना है ताकि अगले साल राष्ट्रपति चुनाव का रास्ता तैयार किया जा सके.
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इमेज कैप्शन, सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक में मुसलमानों और इसाईयों के बीच लगातार बढ़ते फासले के साथ साथ ही ये भी साफ हो गया कि अंतरिम सरकार, अफ़्रीकी यूनियन और फ्रांसिसी वार्ताकारों को कानून का शासन बहाल करने के लिए लगातार कोशिश करनी पड़ रही है. संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार एजेंसी के अधिकारियों का कहना है कि यहाँ मानवाधिकार हनन के मामले बढ़ रहे हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है. राजधानी बांगुई और देश के दूसरे हिस्सों में सड़कों पर हिंसक घटनाओं को लगभग रोज ही अंजाम दिया जा रहा है.
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इमेज कैप्शन, इन घटनाओं में शामिल ज्यादातर लोगों को बिना किसी कार्रवाई के छोड़ दिया जा रहा है. और इसकी वजह बस इतनी सी है कि ऐसे अपराधों की रोकथाम करने वाली सरकारी मशीनरी का कामकाज लगभग पूरी तरह से ठप है. यहाँ फैली बद-इंतजामी का हाल बांगुई की सेंट्रल जेल में जाकर समझा जा सकता है कि वहाँ इन मुश्किल हालात में अपराधियों को किस तरह से हिरासत में रखा जा रहा है. बाहर का जो हाल है, उसका असर जेल के भीतर भी पड़ा है.
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इमेज कैप्शन, एक मामले में तो भीड़ ने जनवरी के महीने में जेल पर हल्ला बोल दिया, एक काल कोठरी तोड़ डाली और कम से कम दो कैदियों पर हमला किया. माना जाता है कि वे कैदी मुसलमान थे. इस वारदात में कुछ कैदी फरार हो गए. जेल के भीतर के हालात का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मुसलमान कैदियों को हिरासत में रखे गए दूसरे कैदियों से अलग रखा गया है और इसकी वजह सेंट्रल अफ़्रीकन रिपब्लिक की जातीय हिंसा के हालात हैं.
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इमेज कैप्शन, अफ़्रीकी यूनियन के सैनिक इस जेल की बाहर से सुरक्षा के लिए मुस्तैद हैं और इसके भीतर की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी स्थानीय 'जेंडारमेरी' सैनिकों और जेल के सुरक्षा गार्डों की है. यहाँ मुसलमान कैदियों की संख्या तीस के करीब होगी जिन्हें अलग कोठरियों में रखा जाता है. उनमें से कई लोगों को ये पता नहीं है कि जेल के बाहर उनके परिवार के सदस्य किन हालात में होंगे. इन्हें पता नहीं कि उनके घरवाले बांगुई छोड़ने में कामयाब हुए होंगे या फिर देश से बाहर चले गए होंगे कि क्या पता वे अभी भी पड़ोस के शहरों में मुश्किल हालात से जूझ रहे होंगे.
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इमेज कैप्शन, जेल में उनसे मिलने कोई नहीं आता है. ये किसी मुसलमान के लिए खुदकुशी करने जैसा ही होगा कि वह बांगुई पार कर इस जेल तक पहुँचे. ये जेल बांगुई से सटे इलाके में पड़ता है जहाँ 'एंटी-बलाका' लड़ाकुओं का वर्चस्व है. कोई मुसलमान जो यहाँ तक पहुँचने की कोशिश करेगा, उसे निश्चित तौर पर सफर में ही कहीं अपनी जान गँवानी पड़ सकती है. कैदियों की ये शिकायत है कि उनकी गिरफ्तारी और हिरासत का कोई कानूनी आधार नहीं है और वे अभी भी अपने मामले की वाजिब सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं. उनमें से कई लोग ये भी कहते हैं कि उन्हें दिन में एक बार ही खाना दिया जाता है.
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इमेज कैप्शन, उन्हें ये भी नहीं पता कि उनके साथ क्या होने वाला है और अगर इन हालात में उन्हें रिहा कर दिया जाएगा तो बाहर जहाँ जातीय हिंसा रोजमर्रा की जिंदगी में आम बात हो गई है, वे बाहरी दुनिया के साथ किस तरह से ताल-मेल बिठा पाएंगे. जेल के उन हिस्सों में जहाँ गैरमुसलमान कैदी थे, वहाँ बेहतर सुविधाएँ देखने को मिल रही थी. उनके पास बिछाने के लिए चटाई, इस्तेमाल के लिए बाल्टियाँ और पीने के लिए सिगरेट थीं. इसकी वजह यकीनन ये रही होगी कि उनके दोस्त और परिवार वाले उन्हें देखने आते होंगे.
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इमेज कैप्शन, जेल की दीवारों पर बनी तस्वीरें एक और कहानी कह रही हैं. उस दुनिया की कहानी जिसे कैदी अपने ख्यालों में जीते होंगे और ये भी कि सलाखों के पीछे रहकर वे उस दुनिया को किस तरह से देखते हैं जिसे वे पीछे छोड़ आए हैं. इन दीवारों पर धार्मिक व्यक्तित्वों, लोगों की और यहाँ तक कि साइकिलों की तस्वीरें भी उकेरी गई हैं. मुमकिन है कि ये तस्वीरें उन्हें उनकी दूसरी ज़िंदगी की याद दिलाते हों. सभी तस्वीरें और कैप्शन साभारः समाचार एजेंसी रायटर्स.