बिस्मार्क ने कैसे बिखरे हुए जर्मनी को यूरोप का एक ताक़तवर मुल्क बना दिया

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इमेज कैप्शन, एकीकृत जर्मनी के गठन की औपचारिक घोषणा 18 जनवरी, 1871 को फ्रांस के वर्साय के महल (पैलेस ऑफ वर्साय) में हुई थी.

हमें यह जानकर बड़ा आश्चर्य होगा कि दुनिया में आज बहुत कुछ ऐसा है जो कि बहुत पुराना नहीं है. उदाहरण के लिए आधुनिक देश का विचार ज़्यादा पुराना नहीं है. इसके विचार ने हाल ही में और धीरे-धीरे आकार लिया है.

एक बात और कि इनके विकास की प्रक्रिया हो सकती है कि हमारी सोच से हटकर हो.

अब नई दुनिया (अमेरिकी महाद्वीप) और पुरानी दुनिया (एशिया, अफ्रीका और यूरोप) के देशों को ही लें. नई दुनिया के ज़्यादातर देश जब आज़ाद थे, तब पुरानी दुनिया के कई देशों की अपनी कोई पहचान ही नहीं थी.

इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं. एकीकृत जर्मनी के गठन के अभी केवल 150 साल पूरे हुए हैं. इसके गठन की औपचारिक घोषणा 18 जनवरी, 1871 को फ्रांस के वर्साय के महल (पैलेस ऑफ वर्साय) में हुई थी.

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इमेज कैप्शन, एकीकृत जर्मनी के गठन की औपचारिक घोषणा के लिए मशहूर हॉल ऑफ मिरर्स का चयन किया गया. वहां चार्ल्स ली ब्रून की पेंटिंग के साथ गुंबददार छत थी.

वर्साय में क्यों, बर्लिन में क्यों नहीं?

फ्रांस में मौज़ूद वर्साय के महल का निर्माण लुई चौदहवें (लुई XIV) ने करवाया था. लेकिन इस पर 1870-71 की फ्रांस और प्रशा (जर्मनी का पुराना नाम) की लड़ाई में जर्मन राज्यों की सेना ने कब्ज़ा कर लिया था.

एक होकर जर्मनी बनाने वाले ये राज्य, लुई चौदहवें से घृणा करते थे क्योंकि उनके शासन में फ्रांस ने एल्सेस पर अपनी पकड़ मज़बूत करने के साथ लॉरेन को भी अपने कब्ज़े में ले लिया था.

फ्रांस से जर्मनी के लड़ने की वजहों में से एक यह थी कि फ्रांस के कब्ज़े से जर्मनी के दावे वाले इलाकों को छीन लिया जाए.

वर्साय पर कब्ज़े के बाद जर्मनी ने ऐसा करके उस समय की दुनिया की सबसे ताकतवर सेना फ्रांस को अपमानित किया. फ्रांस की इस दुर्दशा का कारण जर्मन राज्यों की गठबंधन सेना के हाथों हुई उसकी एक नहीं कई विनाशकारी हार था.

इससे भी अधिक प्रतीकात्मक यह रहा कि इस अवसर के लिए मशहूर हॉल ऑफ मिरर्स का चयन किया गया. वहां चार्ल्स ली ब्रून की पेंटिंग के साथ अतीत की जीतों जैसे राइन पर लुई चौदहवें की जीत को छिपाने वाली गुंबददार छत थी.

जर्मनी के गठन का ऐलान करने के लिए इससे बेहतर जगह और क्या हो सकती थी. वहां "ईश्वर की कृपा से प्रशा के राजा" विलियम प्रथम ने घोषणा की कि जर्मन राजकुमारों और आज़ाद नगरों ने उनसे "जर्मन साम्राज्य का फिर से गठन करने के साथ सम्राट के गौरव का फिर से नवीकरण करने और यह पद स्वीकार करने का एक सर्वसम्मत आह्वान किया था."

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इस मांग को अपनी मंज़ूरी देते हुए सम्राट ने कहा, "हम उम्मीद करते हैं कि अब जर्मन लोगों को स्थायी शांति पाने का मौका मिलेगा. यह सीमा पर उनके कठिन और चमत्कारिक संघर्ष का पुरस्कार है. इससे देश को सुरक्षा मिलेगी जो सदियों से फ्रांस के लगातार हो रहे हमलों से संभव नहीं हो पाया था."

इस तरह 26 जर्मन राज्यों को एकजुट करके जर्मन साम्राज्य का गठन हुआ. इसमें चार बड़े राज्य, सात रियासत, छह बड़े ड्यूक क्षेत्र, पांच ड्यूक क्षेत्र, तीन स्वतंत्र हैंसिएटिक शहर और एक शाही इलाके शामिल हुए. यह स्थिति पहले विश्व युद्ध के अंत तक बनी रही, क्योंकि उसके बाद जर्मनी एक गणतंत्र बन गया.

जर्मनी की एकता का श्रेय उसके एक महान रणनीतिकार को दिया जाता है. इसने वहां सदियों से मौजूद शक्ति के शून्य को दूर करके क़रीब चार करोड़ की आबादी वाले जर्मनी को मध्य यूरोप की एक मज़बूत शक्ति बना दिया. नहीं तो शक्तिहीनता की उस दशा में जर्मनी में आंतरिक लड़ाई और बाहरी हस्तक्षेप एक आम बात बन गई थी.

19वीं सदी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक माने जाने वाले इस शख़्स का नाम प्रिंस ओट्टो वॉन बिस्मार्क था.

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इमेज कैप्शन, प्रिंस ओट्टो वॉन बिस्मार्क

आधुनिक जर्मनी के संस्थापक

आधुनिक जर्मनी के संस्थापक के रूप में याद किए जाने वाले बिस्मार्क राजनीति में अचानक आ गए थे. 1847 में उनसे प्रशा के एक बीमार सांसद की जगह लेने को कहा गया था.

एक औसत कुलीन परिवार के दूसरे बेटे के रूप में पैदा होने वाले बिस्मार्क तब तक अपना जीवन बिना किसी ख़ास मक़सद के जी रहे थे. युवावस्था में बहुत मज़ाक और द्विअर्थी बातें करने वाले बिस्मार्क को उनकी इस आदत के चलते लोग "पागल" कहकर बुलाते थे. हालांकि 32 की उम्र में जब वे सांसद बने तो मानो सब कुछ हमेशा के लिए बदल सा गया.

उस समय की राजनीतिक दुनिया की साज़िशों और चालबाज़ियों के दौर में उन्होंने अपने लिए एक अच्छा मौका पाया.

उनके दादा कैबिनेट के मंत्री थे. उनकी मां भी एक ​विद्वान और संपन्न महिला थीं जबकि उनके पिता एक कट्टर रूढ़िवादी कुलीन शख़्स थे. बिस्मार्क ने इन सबके प्रभावों को मिलाकर अपनी राजनीति में इस्तेमाल किया. यह उस समय की राजनीति के लिए एक आदर्श चीज़ थी.

बिस्मार्क की राजनीतिक सोच मैकियावेली से प्रेरित थी. वह एक कट्टर-रूढ़िवादी राजनेता थे.

उन्होंने जल्द ही अपनी पहचान प्रशा और उसके राजा के समर्थक के तौर पर बना ली और 1851 में फ्रैंकफर्ट में प्रशा के दूत बन गए. बाद में वे सेंट पीटर्सबर्ग (1859) और पेरिस (1862) में भी प्रशा के दूत बन गए. इसके बाद 1862 में वे प्रशा के मिनिस्टर-प्रेसिडेंट और विदेश मंत्री बनने में कामयाब हुए. इस तरह उस समय की राजनीति पर उनका कब्ज़ा सा हो गया.

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सीखा हुआ सबक

मिनिस्टर-प्रेसिडेंट रहते हुए बिस्मार्क ने कोशिश की कि जर्मन बोलने वाले अधिक से अधिक इलाके प्रशा के नियंत्रण में आ जाएं.

बिस्मार्क का जन्म 1815 में तब हुआ था जब नेपोलियन की हार लगभग तय थी. जर्मन सेना और उत्साही स्वयंसेवकों के हाथों हुई हार ने बिस्मार्क पर बहुत असर डाला था.

उस जीत की चमक ने बिस्मार्क के बचपन को वीरता और बलिदान की कहानियों से सराबोर कर दिया था. उस संघर्ष की सफलता से उन्होंने यह भी सीखा था कि विदेशी दुश्मनों से भिड़ने पर आपस में लड़ने वाले राज्य भी एकजुट हो जाते हैं.

इसके अलावा दूसरी जिस चीज़ ने उन पर असर छोड़ा वो थी फ्रांसीसी क्रांति के साथ अंकुरित होने वाली राष्ट्रवादी आकांक्षाएं. आज जबकि राष्ट्रवाद को आमतौर पर दक्षिणपंथ से जोड़ा जाता है लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी में इसे वामपंथ से जोड़कर देखा जाता था.

उदारवादियों यानी आमतौर पर शहरों में रहने वाले, बुद्धिजीवी और मध्यम वर्ग, के लिए तानाशाही सरकारों को ख़त्म करने का सबसे असरकारी तरीका राजाओं के बिना और संसद के साथ राष्ट्र राज्यों का निर्माण करना था.

बिस्मार्क हालांकि उदारवादी नहीं थे और राजाओं के दैवीय अधिकार में विश्वास करते थे. हालांकि उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें उदार विचारों को अपनी सोच में शामिल करना चाहिए.

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विजय पताका फहराने का अभियान

सेना में सुधार लाने की प्रशा के राजा की इच्छा से 1862 में एक संकट आ खड़ा हुआ. 1848 से उदार धारा वाली वहां की संसद ने राजा के इस कदम का विरोध किया. बिस्मार्क ने संसद के विरोध के बावजूद सुधार लाने का निश्चय किया और असंवैधानिक तरीकों से ही सही लेकिन ज़रूरी धन का इंतज़ाम करने में सफल रहे.

बिस्मार्क ने जान-बूझकर तीन लड़ाइयां लड़ीं जिनमें से एक में मिली जीत ने जर्मनी के एकीकरण की राह आसान कर दी. उसका ज़ोर-ज़बरदस्ती वाला यह अलोकतांत्रिक व्यवहार एक जुआ था जिसमें उन्होंने विजय हासिल की. 1864 की इस लड़ाई के बाद डेनमार्क के ख़िलाफ़ ऑस्ट्रिया और प्रशा मज़बूत बनकर उभरे थे. इस लड़ाई के बाद डेनमार्क को अपने इलाकों को इन दोनों साम्राज्यों में बांटना पड़ा. हालांकि इससे कोई भी पक्ष खुश नहीं हुआ.

इसके 18 महीने बाद बिस्मार्क ने अपने पूर्व सहयोगी ऑस्ट्रिया को भी युद्ध के लिए उकसाया और उन्होंने इसे भी जीत लिया. इस जीत के बाद हेनोवर, हेसे कैसेल और होलस्टीन प्रशा का हिस्सा बन गए. फिर इन्हें मिलाकर उत्तर जर्मन परिसंघ का गठन हुआ.

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युद्ध के लिए टेलीग्राम संदेश से छेड़छाड़

बिस्मार्क के लिए ज़रूरी था कि जो राज्य उन्होंने कायम किया था उसे और मज़बूत किया जाए. इसके अलावा दक्षिण के चार राज्यों को नए जर्मनी का हिस्सा बनने के लिए भी तैयार करना था. बिस्मार्क के पास यह लक्ष्य हासिल करने का एक फॉर्म्यूला था. देशभक्ति के जोश का लाभ उठाकर उन्होंने पुराने और विदेशी दुश्मनों के ख़िलाफ़ लड़ाइयां लड़ीं. उन्होंने नेपोलियन के समय से ही जर्मन लोगों में मौजूद घृणा के भाव का इस्तेमाल किया. तनाव तो पहले से ही था. अब तो उसे भड़काने के​ लिए केवल एक चिंगारी की ज़रूरत थी.

इसी समय स्पेन ने प्रिंस लियोपोल्ड को अपने खाली सिंहासन की पेशकश की. प्रिंस लियोपोल्ड प्रशा के विलियम प्रथम के रिश्तेदार थे. ऐसे में स्पेन के इस फैसले से फ्रांस को भय लगा. हालांकि लियोपोल्ड की दावेदारी 12 जुलाई को वापस ले ली गई थी. लेकिन इसके अगले ही दिन प्रशा में फ्रांस के राजदूत काउंट विंसेंट बेनेडेटी ने किंग विलियम से संपर्क किया.

फ्रांस ने किंग विलियम से मांग की कि वे यह गारंटी दें कि स्पेन के सिंहासन पर उनके परिवार का कोई सदस्य कभी नहीं बैठेगा. किंग ने उसकी यह मांग विनम्रता से ठुकरा दी. इसके साथ ही यह चर्चा ख़त्म हो गई. इसके बाद पूरी घटना समझाकर बिस्मार्क को एक टेलीग्राम भेजा गया.

बिस्मार्क ने अपने फायदे के लिए इस संदेश के साथ छेड़छाड़ की. उन्होंने इसमें लिखे औपचारिक शब्दों को हटा दिया. इससे लगा कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे का अपमान किया है. इसके बाद इस संवाद के संपादित अंशों को 14 जुलाई को प्रकाशित कर दिया गया. इससे नाराज़ होकर फ्रांस ने पांच दिन बाद 19 जुलाई, 1870 को प्रशा के ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान कर दिया.

दक्षिण जर्मनी के राज्यों ने प्रशा की ओर से लड़ाई में भाग लिया और जीत हासिल की. इसके बाद ऑस्ट्रिया को छोड़कर सभी जर्मन राज्यों ने एकजुट होकर आधुनिक जर्मनी की नींव रख दी.

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जर्मनी के चांसलर

साम्राज्य का एलान होने के बाद बिस्मार्क आधुनिक जर्मनी के चांसलर बनाए गए. इसके बाद उन्होंने जर्मनी में नए सिरे से उद्योगों के विस्तार का काम शुरू किया. वे अगले दो दशकों तक जर्मनी पर राज करने में सफल रहे.

जर्मनी में बिस्मार्क का गज़ब का सम्मान था. केवल छह सालों में उन्होंने तीन महान ​जीत हासिल की थीं और राइक (साम्राज्य) का गठन करने में भी कामयाब रहे थे. जर्मन संविधान की व्यवस्था भी ऐसी थी कि उसे लोगों को खुश करने की ज़रूरत नहीं थी. चांसलर पद पर उनके चुनाव को उस राजा ने मंज़ूर किया था, जिससे बिस्मार्क के रिश्ते बहुत बढ़िया थे.

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राज्यों के बीच धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक विभाजनों का ध्यान रखते हुए बतौर चांसलर बिस्मार्क ने कोशिश की कि नए बने राज्य एकजुट रहें.

हालां​कि उनके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी कि समाजवादी लोग बहुत लोकप्रिय थे. लेकिन बिस्मार्क ने तुरंत उन्हें उनकी शैली में ही जवाब देना शुरू कर दिया. उन्होंने उनके एजेंडे के अनुरूप भी कदम उठाए.

बिस्मार्क ही वह शासक थे जिन्होंने दुनिया में पहली बार किसी देश के पूरे इलाके में स्वास्थ्य बीमा का क़ानून लागू किया. वहीं, उनकी विदेश नीति भी ऐसी रही कि यूरोप में जर्मनी को एक सम्मानजनक स्थान मिल सका.

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हालांकि बिस्मार्क की आलोचना इसलिए भी होती है कि उन्होंने अपना काम साधने के लिए निर्मम और अनैतिक तरीकों का भी इस्तेमाल किया. साथ में लोकतांत्रिक संस्थानों की भी उपेक्षा की. उन्होंने राजनीति में वैसे तरीके आज़माए, जिन्हें बहुत अच्छा नहीं माना जाता था.

सूचना को मीडिया में लीक किया और पत्रकारों को घूस देने में भी नहीं हिचके. उन पर देश के विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों को दबाने का भी आरोप लगा. बहरहाल बिस्मार्क ने 1890 में अपनी सत्ता छोड़ दी. इसके आठ साल बाद उनकी मौत हो गई.

उनके उत्तराधिकारियों ने विल्हेम द्वितीय को नया राजा बनाया. उस अपरिपक्व राजा की गलत नीतियों से यूरोप में तनाव बढ़ा और जर्मनी की एकता भी ख़तरे में दिखने लगी. हालांकि बिस्मार्क ने जो मिसाल कायम की थी, वो उनके जाने के लंबे समय बाद भी जर्मनी को राह दिखाने का काम करती रही.

पूरी दुनिया में मूर्तियों से लेकर स्मारक और सड़क तक 10 हज़ार चीज़ों के नाम बिस्मार्क के सम्मान पर रखे गए हैं. बिस्मार्क के योगदान का ही कमाल रहा कि आज भी उन्हें दुनिया का अद्भुत राजनेता माना जाता है.

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