You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कंडोम से लेकर टायर तक तैयार करने वाले रबर का विवादास्पद और रक्तरंजित इतिहास
रबर के इतिहास को अक्सर ही उस अमरीकी अन्वेषक के नज़रिए से देखा जाता है, जिन्होंने क़र्ज़ और लगातार नाकामियों के बावजूद रबर को सख़्त करने की प्रक्रिया खोज निकाली थी.
इसी खोज ने बाद में कारों, ट्रकों, एयरोप्लेन और दूसरी मशीनरियों के लिए टायर बनाने का रास्ता दिखाया. उस शख़्स का नाम चार्ल्स गुडइयर था.
बहुराष्ट्रीय कंपनी 'द गुडइयर टायर एंड रबर कंपनी' ने चार्ल्स के सरनेम को दुनिया के इतिहास में अमर कर दिया.
लेकिन ऐसा नहीं था कि गुडइयर से पहले रबर के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी. दक्षिण अमरीका के मूल निवासी इससे पहले से वाकिफ़ थे.
साल 1490 के आसपास इन मूल निवासियों ने एक तरह का मोम तैयार कर लिया था जो पेड़ों से मिलता था. ये पेड़े चीरा लगाने पर 'दूध' देते और इसी से मोम तैयार किया जाता था.
ये 'दूध' एक तरह का गाढ़ा गोंद होता था और उस पेड़ का नाम था 'हेविया ब्रासीलिएंसिस'. 'रबर' नाम मिलने की भी अपनी कहानी है.
जब फ्रेंच लोग अमेज़ॉन के जंगलों में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि स्थानीय मूल निवासी इन्हें 'काउचोउक' कहते हैं, जिसका मतलब होता था 'रोने वाले पेड़.'
लेकिन 19वीं सदी तक रबर वो चीज़ थी, जिसके बारे में दुनिया जानना चाहती थी.
बीबीसी के पत्रकार टिम हरफोर्ड ने '50 थिंग्स डैट मेड द मॉडर्न इकॉनॉमी' नाम से एक सिरीज़ की थी, जिसमें उन आविष्कारों और खोजों के बारे में बताया गया है जिससे अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव हुए.
चार्ल्स गुडइयर की खोज
1820 के दशक में रबर को लेकर दुनिया की दिलचस्पी तेज़ी से बढ़ने लगी थी. ब्राज़ील से यूरोप तक इसकी खेंप बड़े पैमाने पर भेजी जा रही थी.
जूते, हैट, कोट, लाइफ़ जैकेट रबर से ही तैयार होते थे. यहाँ तक कि चार्ल्स गुडइयर की पहली नाकाम खोज इन्फ्लेटर ट्यूब बनाने की कोशिश ही थी, जिससे लाइफ़ जैकेट में हवा भरी जा सके.
लेकिन ये इन्फ्लेटर ट्यूब सर्दियों में बेहद कड़े हो जाते हैं और गर्मियों में लचीले.
टिम हरफोर्ड बताते हैं, "किसी बेहद गर्म दिन में गुडइयर ने देखा कि उसकी खोज पिघल रही है और उससे गंध भी आ रही थी."
लेकिन इस नाकामी को भी गुडइयर ने अवसर की तरह देखा. रबर को स्थिर बनाए रखने का तरीक़ा खोजने में गुडइयर ने पाँच साल गुज़ार दिए.
दिक्कत ये थी कि वे केमिकल इंजीनियरिंग के जानकार नहीं थे. उन पर क़र्ज़ बढ़ता जा रहा था और इस वजह से उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा.
आख़िरकार साल 1839 में चार्ल्स गुडइयर ने अचानक अनायास रबर को और सख़्त बनाने की प्रक्रिया खोज ली.
रबर, सल्फर और आग के इस्तेमाल से उन्होंने जो तरीक़ा खोज निकाला, उससे आधुनिक दुनिया में आमूलचूल बदलाव हुए.
लेकिन अभी एक और आविष्कार होना बाक़ी था. 1880 के दशक के आख़िर में स्कॉटिश साइंटिस्ट जॉन बॉयड डनलप के हाथों वो खोज हुई. उस नई चीज़ का नाम था टायर.
रबर के बिना गुज़ारा न रहा
साइकिल और कारों के टायर बनाने के अलावा रबर का इस्तेमाल फैक्टरियों में स्वचालित काम के लिए ट्रांसपोर्ट बेल्ट्स बनाने में होने लगा.
ये विद्युत का कुचालक था, इसलिए इसका इस्तेमाल केबल वायर के कवर में होने लगा. इससे कंडोम तैयार किए जाने लगे.
ऐसी कई चीज़ें जिनके लिए रबर ज़रूरी ही नहीं, अपरिहार्य बन गया था. रबर की मांग अचानक इतनी तेज़ी से बढ़ी कि यूरोप के देश दुनिया भर में इसकी खाक छानने लगे.
इन्हीं कोशिशों के तहत एशिया में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई की गई, ताकि रबर प्लांट (हेविया ब्रासीलिएंसिस) लगाए जा सकें.
लेकिन ये पेड़ बढ़ने में लंबा समय लेते थे. दूसरे ऐसे पौधों का भी पता चला, जिनसे कम मात्रा में रबर मिलता था.
पश्चिमी देशों के लिए रबर एक ऐसी चीज़ थी, जिसके बिना उनका काम धंधा मुश्किल था. उन्हें अफ़्रीका में इसके सबसे बड़े स्रोत का पता चला.
दुनिया अफ़्रीका के उस हिस्से को आज 'डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो' के नाम से जानती है.
टिम हरफोर्ड कहते हैं, "लेकिन पश्चिमी देशों के सामने सवाल ये था कि रबर की ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा जल्द से जल्द कैसे हासिल की जा सकती थी."
"अगर नैतिकता के मुद्दे को किनारे कर दें तो इसका सीधा सा जवाब था, किसी शहर में सशस्त्र लोगों को भेजो, महिलाओं और बच्चों को अगवा करो और अगर फिर भी पुरुष पर्याप्त रबर न ला पाएँ तो किसी के हाथ काट दो या फिर उसके किसी रिश्तेदार की जान ले लो."
इस हिंसक योजना के सूत्रधार थे, इतिहास के सबसे बदनाम राजाओं में से एक बेल्जियम के किंग लियोपॉल्ड द्वितीय.
आतंक का राज
कांगो को उस ज़माने में 'कांगो फ्री स्टेट' (ईएलसी) के नाम से जाना जाता था. 'कांगो फ्री स्टेट' का निज़ाम ऐसा नहीं था, जिसे उपनिवेश के दायरे में रखा जा सके.
ये तो बेल्जियम के किंग लियोपॉल्ड द्वितीय की निजी जागीर जैसा था.
इतिहासकार सियान लैंग ने बीबीसी हिस्ट्री मैगज़ीन के लिए लिखा था, "ईएलसी को दुनिया के सामने स्वतंत्रता और समृद्धि के एक मॉडल के तौर पर पेश किया गया था. लेकिन धीरे-धीरे दुनिया ने जान लिया कि दरअसल कांगो के लोगों को ग़ुलाम बना लिया गया है और उन पर आतंक के ज़रिए हुकूमत की जा रही है. कांगो के पास तांबा, हाथी दाँत, और रबर का अकूत भंडार था."
"किंग लियोपॉल्ड ने एक तरफ़ तो इसकी लूट शुरू कर दी तो दूसरी तरफ़ कांगो के लोग सज़ा, यातना और शोषण से बचने के लिए मजबूर होकर काम करने लगे. निर्धारित मात्रा से कम रबर इकट्ठा करने वाले या काम छोड़कर भागने वाले मजदूरों के हाथ-पाँव काट देना आम सज़ाएँ हो गई थीं. कभी-कभी तो घरवालों, पूरे कबीले या फिर गाँव के गाँव उजाड़ दिए जाते थे."
किंशासा में बीबीसी संवाददाता रहे मार्क डमेट ने साल 2004 में अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था, "किंग लियोपॉल्ड ने अपनी ईएलसी को एक बहुत बड़े लेबर कैंप में बदल दिया था. यहाँ से रबर इकट्ठा करके उन्होंने अकूत दौलत जुटाई थी लेकिन यहाँ उन्होंने तकरीबन एक करोड़ मासूम लोगों की जान ले ली थी."
एक करोड़ मासूम लोगों की जान जाने के आँकड़े पर भले ही विवाद हो सकता है लेकिन किंग लियोपॉल्ड की हुकूमत में हुई बर्बरता को लेकर कोई दो राय नहीं है.
जंगलों की सफ़ाई
दुनिया में आज जितने रबर का उत्पादन हो रहा है, उसका आधे से ज़्यादा हिस्सा रोने वाले पेड़ों से नहीं आता बल्कि सिंथेटिक पदार्थों से तैयार किया जाता है.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सिंथेटिक रबर का विकास किया गया. ये सस्ता तो था ही, कुछ मामलों में प्राकृतिक रबर से बढ़िया भी.
उदाहरण के लिए, साइकिल के टायर में इस्तेमाल होने वाला सिंथेटिक रबर ज़्यादा बेहतर माना जाता है.
लेकिन ऐसे उद्योग हैं, जिनके लिए हेविया ब्रासीलिएंसिस के पौधों से निकलने वाला रबर अपरिहार्य है.
इन पौधों से तैयार होने वाले रबर का तकरीबन तीन चौथाई हिस्सा भारी गाड़ियों के टायर बनाने में काम आता है.
हमें ज़्यादा कारें, ट्रक और हवाई जहाजों का उत्पादन कर रहे हैं, इसका मतलब हुआ कि हमें ज़्यादा रबर की ज़रूरत पड़ेगी. और इसकी सप्लाई बिना विवादों के संभव नहीं है.
साल 2015 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ ईस्ट एंगलिया के पर्यावरण विज्ञान विभाग ने एक स्टडी की थी.
स्टडी की लीड रिसर्चर एलियानोर वॉरेन थॉमस का कहना है कि रबर टायरों की वैश्विक मांग के कारण दक्षिणपूर्वी एशिया में जंगलों की कटाई बढ़ी है.
उन्होंने बीबीसी से कहा था, "साल 2024 तक माँग की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 4.3 से 8 मिलियन हेक्टेयर ज़मीन पर नए पौधे लगाने की ज़रूरत पड़ेगी. इससे एशिया के जंगलों के बड़े हिस्से की कटाई का ख़तरा बढ़ेगा. वन्य जीवों पर भी इसका असर पड़ेगा."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)